विशेष

और बिरियानी ग़ायब हो गयी,,,एक सच्चा वाक़िया!

ये दुनियां गौर और फिक्र की जगह है, कभी ये रात और दिन जो आते हैं बारी-बारी, फिर कभी आसमान की तरफ़ चले जाना,,,ज़रा सोचें और देखें कि जो ये क़ायनात है वो ”ऐसे” ही नहीं बन गयी

जब कहीं भी कुछ भी नहीं था, ‘वो’ तब भी था, वोही हमेशा रहने वाला है, बाकी जो कुछ भी हमें नज़र आता है और जिन चीज़ों को लपकने के लिए हम दौड़ते हैं, बाक़ी नहीं रहने वाला, इस ज़मीन पर जो कुछ भी हमारी आंखें देखती हैं सब कुछ एक वक़्त तक के लिए हैं

एक वाक़िया बताता हूँ,,,,बात 2004 की है, मै और मेरे दोस्त मलखान सिंह दोपहर के वक़्त अलीगढ के पुरानी चुंगी पर थे, हमने यहाँ बिरयानी खायी, उसके बाद मैंने कॉल की एक लड़के को जोकि तब मेरे साथ रहता था, पूंछा कि कुछ खाओगे,,,तो उसने कहा कि ‘बिरियानी लेते आना’,,,मैंने शायद तीन किलो बिरयानी पैक करवा ली और हम दोनों वहां से मंज़ूरगढ़ी गॉंव के पास बिस्मिल्लाह कॉलोनी पहुँच गए, बिस्मिल्लाह कॉलोनी को तब मैने ही बसाना शुरू किया था, यहाँ पर तब मेरा रियल एस्टेट का कारोबार था, इसी जगह पर एक तालाब में बीस हज़ार मांगूर नस्ल की मछलियां पाली हुई थीं, उस वक़्त चंदा, राग़िब, तल्हा, लाईक, दिलशाद वगैरह कई लोग रहते थे, जोकि मेरे साथ जुड़े हुए थे

बिरियानी लेकर जब मै और मलखान सिंह वहां पहुंचे तब उन लड़कों में से कोई भी वहां मौजूद नहीं था, कमरा खुला हुआ था, मैने कमरे के अंदर बेड पर वो बिरियानी रख दी और कमरे के बाहर, बिलकुल दरवाज़े के सामने एक कुर्सी पर मलखान सिंह बैठ गए एक पर मेँ, हम दोनों आमने सामने थे और बीच से कमरे में जाने की जगह थी, ये सर्दियों का वक़्त था,,,तभी वो सभी आ गये, मैंने तल्हा से कहा कि देखो बिरियानी रखी है सभी लोग खा लो अभी गर्म है,,,तल्हा कमरे में अंदर गया और बाहर आ के बोला वहां तो बिरियानी है नहीं,,,मैंने उसे कहा कि देखो, सामने ही बैड पर रखी है,,,वो फिर अंदर गया और कहने लगा,,,वहां नहीं है,,,अच्छा तल्हा की आदात थी कि मज़ाक़, छेड़खानी बहुत करता था,,,मुझे लगा ये तफ़रीह कर रहा है,,,,उसके बाद मै खुद कमरे के अंदर गया और जहाँ बिरियानी अपने हाथों से रखी थी, देखा वहां नहीं है,,,कमरे में जो सामान रखा था उसमे देखा कि शायद इसने कहीं छिपा दी होगी,,,लेकिन बिरियानी मुझे भी नहीं मिली,,,तब भी मुझे लग रहा था कि तल्हा ने छिपा है,,,तो मैने उसे डांट कर कहा कि निकाल कर ला कहाँ छिपा दी है, ठंडी होने पर खाओगे,,,इस बार तल्हा ने बेसाख्ता कहा,,,”ख़ुदा की क़सम” मैंने नहीं छिपाया है,,,,मुझे मिली ही नहीं है,,,उसका ये जवाब मिलने के बाद में कमरे से बाहर आ कर चेयर पर बैठ गया,,,

न तो कमरे में कोई गया, न कोई आया, उस कमरे का सिर्फ एक ही दरवाज़ा था जिसके बाहर हम दो लोग बैठे ही थे, एक विंडो था जोकि बंद था,,,फिर बिरियानी कहाँ गयी,,,,मलखान ने भी कमरे में जा के तलाश किया, नहीं मिली,,,हम यहाँ मौजूद हैं, कोई जानवर भी तो इधर नहीं आया, फिर भी जानवर अगर उठा कर ले जाता तो,,तीन किलो है,,,पॉलीथिन के पैक में थी, वो फटा,,,चावल तो कम से कम गिरते,,,जो लड़के वहां मौजूद थे उन्होंने आस पास में देखा, मलखान सिंह मुस्तकिल इधर-उधर देखते रहे,,,मगर बिरियानी नहीं मिली,,,,ये जो कुछ हुआ वो चर्चा का मुद्दा बन गया,,,मेँ हैरान था कि हुआ क्या है,,,,शाम को घर आना हुआ,,,,लेकिन बिरियानी के न मिलने की कहानी दिमाग़ में घूमती रही,,,,खाना पीना होने के बाद मैंने मेरे एक जाने वाले कॉल की, वो दीनदार, मौलवी था,,,मैने उनको बताया कि ”शहाबुद्दीन भाई, आज ऐसे ऐसे मामला पेश आया”,,,ये रात एक दस बजे का वक़्त रहा होगा,,,जैसा कि बताया कि तब सर्दियाँ थीं,,,,शहाबुद्दीन का फ़ोन अब मेरे पास उसी रात कोई दो बजे आया,,,बताया कि ‘मै यहाँ आप के तालाब पर हूँ,,,और भाई वो बिरियानी जो परियां आप के तालाब में मौजूद हैं वो ले गयीं थीं’,,,मछलियों का जो तालाब है उसमे मछलियों को सूरत में कई सारी परियां यानी कि जिन्नात हैं,,,,और ये बहुत बड़ी हैं,,,जो मछलियों को भी खाती हैं,,,शहाबुद्दीन ने कहा कि किसी दिन बिरियानी बनवा के फ़ातेहा पढ़ कर मासूम बच्चों को ज़रूर खिलवा देना,,,और आप को इस तालाब से ज़रा भी नफा नहीं होगा,,,,

अल्लाह भला करे,,,जब तालाब को ख़ाली करवाया तो उसमे 70-80 किलो वज़न तक की दर्ज़नों मछलियां निकलीं,,,पूरा तालाब मैंने लोगों के हवाले कर दिया कि जिसको भी जितनी मछलियां ले जाना है ले जाओ,,,,और वो तालाब ख़ाली हो गया,,,,बिना किसी नफ़ा के,,,लेकिन बिरियानी के ग़ायब होने का क़िस्सा ऐसा है जो हमेशा याद रहेगा,,,सोचा आप को भी बताया जाये,,,,,परवेज़ ख़ान

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