साहित्य

स्तुति माँ की….by मंजुल सिसोदिया

मंजुल सिसोदिया
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स्तुति माँ की
हे जगत जननी,
जगदंबिके !
इस जग की आधारभूता,
शक्ति ,भक्ति दायिनी ।
सिद्धि, बुद्धि दायिनी तुम,
भक्त वत्सला गुण दायिनी।
हो अभय दायिनी तुम,
सर्व दुःख निवारिणी।
सर्व पाप हारिणी, जगत धारिणी,
रत्न स्वरुपा,जगत तारिणी।
रक्तबीज संहारिणी तुम,
हो महिषासुर घातिनी।
शिव शक्ति स्वरूपा,भगवती तुम,
हो शंख चक्र, धारिणी।
सर्व मंगलमयी, सर्व जगत संमोहिनी,
हो सर्व जगत उद्धारिणी।
सर्व स्वरूपा,सर्वेश्वरी,अनेकार्थी,
दक्षयज्ञविनाशिनी,सत्यानंद स्वरूपिणी।
सर्वबाधानिवारिणी,धन धान्य दायिनी,
हे करूणा निधि, जीवन दायिनी।
हे जगदंबिके!
शत शत तुम्हें नमन।
हे वर दायिनी!
ऐसा वर दो,
मेरे मानस में,
नव चेतन भर दो।
मेरे तपते जीवन को,
अपनी करूणा वर दो।
हे दयानिधि!
चहुदिशी,,,,,,,,,,
भक्ति रस धार बहे,
विशुद्ध ज्ञान का सार बहे।
मानव मन के दानव का,
संहार करो, संहार करो।
भ्रम से भ्रमित मानव का,
उद्धार करो, उद्धार करो।
हम सब तेरे,
बालक हैं।
तू तो जग की,
पालक है।
माँ बस,
इतना कर दो,
जग चेतन में,
नव रस भर दो।
नत मस्तक हो,
शत शत तुम्हें नमन।
मंजुल सिसोदिया

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