साहित्य

मेरी याद में वह उनका आख़िरी आशीर्वाद था, उसके बाद उनकी सिर्फ़ यादें बची हैं

Satyendra PS
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मेरे नाना जी। उनके बहुत किस्से याद हैं। निहायत धार्मिक व्यक्ति थे। आज फोटो दिखी तो कैमरे से फोटो खींचकर डिजिटल कर लिया।
उनके भीतर गज्जब का आत्मविश्वास था। स्वतन्त्रता के पहले राजा के लठैत हुआ करते थे। उनके एक पंडीजी मित्र अक्सर उलाहना दिया करते थे कि रानी उनको “लाल” (सोने की अशर्फियाँ) दे रही थीं, जो उन्होंने नही लिए।
उनकी ढेरों कहानियां यादों में हैं।

वह पंचायती थे और न्यायप्रिय। एक जगह पंचायत में गए और उन्हें पता नहीं था कि दोषी पक्ष के पक्ष में वह खड़े हो गए थे अनजाने में। गांव वालों को भरोसा था कि वह सही फैसला करेंगे, लेकिन अनजाने में गलत फैसला कर दिए तो गांव की महिलाओं ने उनको घेर लिया और खपड़ा, पत्थर, ईंट चलाने लगीं। नाना जी का बाना इलाके भर में प्रख्यात था। व लाठी भांजने लगे। 2 और लोगों को बचाना था। लाठी भांजने में जो ईंट पत्थर रिवर्ट हुआ, उससे कई महिलाएं घायल हो गईं। करीब 3 घण्टे लाठी भांजने और लाठी डंडे छीनने में वह थक गए। हाथ की उंगली फट गई थी। अपराधबोध भी था कि उनसे कैसे गलती हो गई थी! अपना खुद इलाज कर रहे थे और टिटनस हो गया। उनको लादकर गोरखपुर में डॉ मल्ल के दवाखाने लाया गया, उस समय वही फेमस थे।

अम्मा बताती हैं कि डॉ मल्ल ने कहा कि 12 घण्टे बहुत क्रूशियल है, बचेंगे कि नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता। नानी रोने लगीं। नाना जी ने अम्मा से कहा, लठिया उठाव त, हम मरली नाहीं, ओकरे पहिलही ई असगुन करति बा! अम्मा बताती हैं कि वो 10 साल की थी और केवल उनका आत्मविश्वास याद है कि उन्होंने कहा, डक्टरवा भले मरि जा, अबहिन हम न मरब। उस समय उनके मुंह से आवाज साफ नहीं निकल रही थी, दांत बैठ गया था।

दूसरे दिन जब सुबह डॉक्टर मल्ल आए तो उन्होंने कहा कि सब ठीक है। अब कुछ नहीं होगा इनको। नाना जी स्वस्थ हो गए।

नाना जी ने एक बार एक शर्त लगा दी। उन दिनों पट इंजन चलता था और वह पलेवा में फंस गया। कई टीन एजर उसे खींचने की कोशिश कर रहे थे। नाना जी बोले कि तुहन के उमिर के रहली त अइसन इंजन उठाके गांव तक ले के चलि जइती। लौंडों ने कहा कि अब उठाके चकरोडवे तक धई दा। बात बढ़ते बढ़ते शर्त लग गई 500 रुपये की। जितने का इंजन नहीं, उसके 5-7 गुने की शर्त!

नाना जी ने कहा, भगवान चाहिहैं त धई देब। काल्हि तक के टाइम दे तुहन। नाना जी का आत्म विश्वास हिला हुआ था। रात को वह अकेले गए। इंजन उठाकर देखा। दूसरे रोज गांव के लोग जुटे। नाना जी ने घोषणा की कि प्रभु ने साक्षात उन्हें आशीर्वाद दे दिया है, वह कोशिश करेंगे। नाना जी ने इंजन उठाया और करीब 5 मीटर दूर चकरोड पर रख दिया। उसके बाद उनकी कमर में चिलक पड़ गई। हार्निया हो गया और आंत उतरकर बाहर आ जाती थी, जो मैंने भी उन्हें झेलते देखा था।

नाना जी का आशीर्वाद बहुत फलित होता था। वह जो कह देते थे, वह काम हो जाता था। ऐसी ढेरों कहानियां हैं। एक मौसी जी दसियों साल तक डॉक्टर को दिखाते थक गई थी। नाना जी से बोलीं कि बाऊ जी तुहके आशीर्वाद देवे के परी, रोने लगीं। नाना जी बोले कि कौन कहता है कि तुमको बच्चे नही होंगे? ईश्वर कह रहा है कि तुमको बच्चे होंगे। मौसी जी को 3 बच्चे हुए, दो बेटी और एक बेटा। तब तक नाना जी का देहावसान हो चुका था और मौसी जी बच्चों को नाना का आशीर्वाद नहीं दिला पाईं। मेरी याद में वह उनका आखिरी आशीर्वाद था, उसके बाद उनकी सिर्फ यादें बची हैं।

मैं शुरू से अधार्मिक था। अम्मा भी वैसे ही थी। रात को प्रभु के आने और आशीर्वाद देने की कहानी उन्होंने सबको बता दी थी कि वो रात को इंजन उठाकर देख आये थे, कोई प्रभु वगैरा नहीं आए थे। नाना जी अम्मा को कहते थे, “बूड़ा वंश कबीर का, उपजा पूत कमाल।” ऐसे मौसी जी एक बार हमसे लड़ गई जब मैंने कहा कि कोई भगवान वगैरा नहीं होता,तो उन्होंने कहा कि ‘”अपने नाना के का कहबा, ऊ सिद्ध पुरुष रहलें कि नाही।” मैं उनसे कहता कि आप इलाज करा रही थीं और यह महज संयोग था कि नाना जी के आशीर्वाद के बाद आपको बच्चे हुए! वह बोलती थीं कि “तू एतने मानि ल कि डॉक्टर के दवाई 10 साल से नाही काम करति रहलि और उनके आशीर्वाद के बाद काम कई गइल!”

नाना अमीन थे। सरकारी नौकरी रास न आई और छोड़कर भाग आए। अम्मा इकलौती बिटिया थीं। उनकी दबंगई थी। “अमिनवा के बिटिया के कुछ न बोलिहे नई त मारि डारी”, लोग कहते थे। इतना मानते थे कि हम लोगों को बोलते कि लइका कहि दे त गांव फुंकवा देई, ई कौन मांग बा कि न पूरा होई! वो और उनकी दर्जनों कहानियां यादों में बसी हैं। अच्छे पहलवान,अच्छे लठैत, बेहतर भाषणबाज, अच्छे तबला वादक, अच्छे नगाड़ा बजाने वाले, उर्दू के अच्छे जानकार और कबीर, नानक, रैदास, चोखामेला के सैकड़ों दोहे उनकी जुबान पर रहते थे।
नाना जी की याद आती है तो लगता है कि अभी उनके जूते में मेरे जैसे कई पांव समा जाएंगे।
#भवतु_सब्ब_मंगलम

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