विशेष

हमारी न्याय-व्यवस्था माफ़िया तंत्र की वारिस है, दुनिया में किसी ने दूसरों को बहुग्राह्य भाषा से वंचित करके, उस पर एकाधिकार नहीं जमाया जैसा भारत में ब्राह्मणों ने किया!

Bhagwan Singh
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भाषा और इतिहास
(बात बेबात)
हम इस शृंखला में कुछ ऐसी बातें करने जा रहे हैं, जिन्हें आपने हू-ब-हू मान लिया तो धोखा खाएंगे और नहीं माना तो हाथ मलते रह जाएंगे। फूंक-फूंक कर पांव रखने वाले कभी श्रद्धा के पात्र समझे जाते थे, यद्यपि फूूंकने की जगह वे भी जमीन को बुहारते हुए ही आगे बढ़ते थे और जिन क्षुद्र जीवों को पांवों तले कुचल कर मरने से बचाना चाहते थे, उनमें से बहुतों की मौत उनकी झाड़ू से ही हो जाती रही होगी। इसलिए मुहावरे को सच बनाने वाले फुंकनी ले कर चलने वाले लोग भी रहे होंगे, जिनको जैनियों ने भी पागल समझा होगा, इसलिए उनको उनके साहित्य में भी शायद ही जगह मिली हो। यह काम जब उन्होने छोड़ दिया तो हमारी याआप की क्या हैसियत! हमारी हैसियत तो इतनी ही है कि यह समझ सकें कि शब्दों और मुहावरों के पीछे एक इतिहास, एक दर्शन, एक विचारधारा भी हो सकती है। इसलिए शब्दों पर बात चले तो फूंक फूंक कर पांव रखना एक जरूरत और जिम्मेदारी भी बन जाती है।

इस चर्चा में हम आप को किसी मुहावरे के अनुसार चलने की सलाह तो न देंगे परंतु आप से एक-एक वाक्य को घूर-घूर कर देखने की अपेक्षा अवश्य करेंगे। आपको पता है लोग घूरने का काम कबसे करते आ रहे है? यानी, घूरने कै लिए घूरना शब्द का प्रयोग कबसे करते आ रहे हैं। यदि आपको नहीं मालूम तो समझें मेरी दशा भी वही है, फिर भी क्या आपने फारसी ‘ग़ौर’ को घूरने से मिला कर देखा है? अब यदि दुबारा ग़ौर करें तो इस शब्द का इतिहास तीन-चार हजार साल पीछे चला गया, जब कि संस्कृत में आंखें फाड़ फाड़ कर देखें तो भी यह कहीं दिखाई न देगा। इसीलिए हम आग्रह करते हैं कि आपकी तनिक भी असावधानी से किसी शब्द के प्रति अन्याय होने, या किसी दूसरे की हैसियत बढ़ने की ही संभावना नहीं है, इतिहास की धुरी इधर से उधर खिसक जाने तक की संभावना है। जो कुछ जीवन और व्यवहार से लुप्त हो जाता है वह भी भाषा में एक रहस्यमय तरीके से हजारों साल तक किसी कोने में दुबका बचा रहता है। इसलिए जो इतिहास की किसी पुस्तक में दर्ज नहीं है, जिस तक पुरातत्वविद तक की पहुंच नहीं हो सकती, उसको आप कई बार भाषा में प्रत्यक्ष देख सकते हैं। जो अन्यत्र मृत और अश्मीभूत मिलेगा, वह भाषा में स्पंदित और जीवन्त मिल सकता है – इतना कि आप चाहें तो उसकी धड़कनें भी गिन लें – गो यह हर मामले में जरूरी नहीं। फिर भी जो भाषा में अतिरंजित मिलेगा, वह शब्दों में कांटे की तौल मिलेगा।

पर इतिहासकारों की समझदारी देखिए, जो इतिहास के अध्ययन का सबसे विश्वसनीय स्रोत था उसकी उन्होंने साख ही खत्म कर दी। क्यों भला? इसलिए कि धोखाधड़ी, प्रलोभन और संस्कृत शिक्षा पर सबसे पहले अधिकार करके ब्राह्मणों को यह समझा तो लिया कि हम तुम तो हैं भाई-भाई (1962 के हिंदी-चीनी भाई-भाई, दोनों में क्यों चले लड़ाई, चीनी को आगे बढ़ने दो, बनी रहेगी तभी सगाई। आधा वे खुलकर बोले थे आधा मुझको पड़ा सुनाई) की तरह। तुम पहले आए थे, हम बाद में आए हैं। जिनको सांस्कृतिक प्रतिरोध करना था, मोर्चे पर खड़ा होना था, वे जयजयकार करने लगे। राजा न सही राजा की बिरादरी का ही सही, यह दमित लालसा हावी हो गई, और भाषा और संस्कृति के रक्षकों ने मोर्चे पर खड़ा होना भी जरूरी नहीं समझा, जो खड़े हुए उनका उपहास किया। मुहावरा सिर काट कर पेश करने का है पर उसमें सिर एक का होता है, काटने वाला कोई दूसरा और पेश करने वाला तीसरा। पर यदि तीनों काम एक ही व्यक्ति या वर्ग को करना हो तो वह सिर तो नहीं कलम करेगा, दिमाग पेश कर सकता है और उन्होंने वही रास्ता चुना। जन-गण मन अधिनायक जय हे, लिखा बाद में गया, गाया बहुत पहले से जा रहा था

सांस्कृतिक उठाईगीरों के पौ बारह। पर एक समस्या थी। उठाईगीर माल ले कर तो चंपत हो सकता है, पर आगे जांच हो और पुलिस रसीद दिखाने को कहे तो रसीद नहीं दिखा सकता। तुलनात्मक भाषाविज्ञान ऐतिहासिक भाषाविज्ञान था और पहली ही जांच में फेल हो गया। सस्युर ने कहा तुम्हारा विज्ञान तुम्हारे अज्ञान का प्रमाण है। दो कालों के आंकड़ों की तुलना नहीं हो सकती। तुम विज्ञान हो ही नहीं, कलाबाजी हो। चेक पोस्ट के सिपाही ने वह काम किया जो घर के चौकीदार ने न किया था। पर यह न समझें कि चौकी का सिपाही पूरी तरह ईमानदार था। यदि होता तो कहता कि मानवता के इतिहास को समझने के लिए, अर्थात् ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के लिए, दो कालों के आंकड़ों की उपलब्धता से अधिक उपादेय क्या हो सकता है?[1] कांटे की बात और टांके की बात की होड़ में टांका मान्य रहा, कांटे पर किसी ने गौर तक न किया।
ऊपर की ओर उठी हुई नोक या इस मुहावरे के अनुसार कांटा जिसके लंबवत खड़े होने पर दोनों पासों की समानता प्रकट होती है। यह सावधानी आधुनिक युग की देन है, पर यह तो पीछे की ओर छलांग मार कर जानें कहां पहुंच गई।

पहले जब तराजू नहीं था, तब समझदार और जिम्मेदार लोग बोलने के पहले इतना सोच विचार करते थे कि जो कहना चाहते थे वही भूूल जाते और काफी समय यह याद करने पर लगाते थे और हार कर सुनने वालों से पूछते थे, ‘मैं कहना क्या चाहता था।’ इस सावधानी की डींग भी हांकते थे। कहते थे, हम केवल सार बचन बोलते हैं, बेकार की बातों को उसी तरह छान कर अलग कर देत हैं जैसे सत्तू को छलनी से छान कर – सत्त – को अपना लेते है और भूसी को अलग कर देते है। इसका बुद्ध पर इतना असर हुआ कि बोले बोलना हो तो आर्य सत्य नहीं तो आर्य मौन ।

इस अंतर को हम लोग नहीं समझ सकते क्योंकि हम बोलने के बाद सोचते हैं और वे बोलने से पहले सोचते थे। हम अपना मोल इस बात से आंकते हैं कि हम जो कहते हैं उसके झांसे में कितने लोग आ गए, हमारा औकात कितनी बढ़ गई; वे तोल की चिंता करते थे, मोल के चक्कर में नहीं पड़ते थे। कहना धो-पखार कर ही है, यदि आज किसी ने नहीं समझा तो कल समझ लेगा। हम नई बात कहना चाहते हैं, वे सही और शाश्वत। खोट किसी तरह की सहन नहीं।

बात शुद्धता, सटीकता अर्थात् सही नाप-तौल की आरंभ हो गई तो छानने और तोलने नापने के तरीकों पर भी गौर कर ले। आज को तारों की बुनी हुई मोटी से पतली तक हर तरह की छलनी मिल जाती है मेरे बचपन में जानवर की अंतड़ी की झिल्ली को ही खजड़ी, डमरू और चलनी के काम लाते थे पर बारीक छनाई का एक तरीका भेड़ के कंबल का छानने के लिए इस्तेमाल करना था। यह तरीका बहुत पुराना है पर ऋग्वेद में इसका प्रयोग तरल द्रव्यों को, उदाहरण के लिए गन्ने के रस को छानने के लिए किया जाता था। कलश के मुंह पर भेड़ के बालों की कंबली रख दी जाती जिससे छन कर रस नीचे कलश में मधुर नाद करता हुआ गिरता था। इसी के आधार पर सोम की एक ऐसे कवि के रूप में कल्पित किया गया जो सुरुचि से वस्त्र धारण किए हुए काव्यपाठ कर रहा हो (भद्रा वस्त्रा समन्या वसानो महान् कविः निर्वचनानि शंसन् )। अब यदि उसी सोम के विषय में पढ़ने को मिले कि वह पत्थर के यंत्र से निकाला गया है और रोओं से छन कर मधुर धारके साथ प्रवाहित हो रहा है (अध धारया मध्वा पृचानस्तिरो रोम पवते अद्रिदुग्धः) और यह प्रवाह असंख्य धाराओ में (सहस्रधारः) है तो इसकी कल्पना करते हुए उलझन में पड़ जाते हैं क्योंकि रोओं से छनने का चित्र स्पष्ट नहीं हो पाता ।

सत्तू चालने के लिए जिस उपकरण का प्रयोग वैदिक काल में किया जाता था उसे तितऊ कहा गया है। इसकी बनावट समझ नहीं आती। मेरे बचपन में मेरे मुहल्ले में एक धरिकार (बंसफोड़) रहते थे। वह बांस की पतली पन्नियों से चलनी बनाया करते थे। संभव है पहले चलनी या तितऊ का यही रूप रहा हो। तितऊ की व्युत्पत्ति कठिन है। संस्कृत में ऐसे शब्द को अनिरुक्त कहते हैं। पर बोलियां ऐसे पदों को समझने में सहायक हो सकती हैं। हमारा अनुमान है तितर-बितर में जो तित (अलग करना) है वही इसके मूल में रहा होगा। क्या जित-तित को ही सं. ने यत्र-तत्र नहीं बनाया।

हम ‘तुला’ शब्द को जानते है, तोला को भी जानते हैं पर तौला (मिट्टी का बर्तन जिसमें लगभग आठ सेर अनाज आ सके, अब भूलते जा रहे हैं। इसका प्रयोग माल ढोने के लिए किया जाता था। कंहार (भारिक) वहिंगा (वहन करने के लिए बांस को चीर और तराश कर बनाए गए लचीले पट्टे) के दोनों सिरों पर रस्सियों के फंदे पर (जिसका निचला पेंदा गेड़ुली जैसा होता था) रख कर ले जाया जाता था। यह भारिक ही तुला का प्राचीनतम रूप है। संतुलन के लिए कांधे (कंभ/ कंध सं. >स्कंभ, स्कंध जिनका तद्भव खंभ/कान्ह) में होता सही जमाव जहां रखने पर कोई नीचे ऊपर हो कर न गिरे। तराजू में पूरा खाका यही है कंधे (खड़े आदमी) का स्थान कांटे ने ले लिया है और आधार गायब है। आगे चल कर मंहगी धातुओं के मामले में तौले ने तोले का रूप ले लिया। और जोड़ का तोड़ में न जोड़ का बतलब जोड़ना होता है न तोड़ का मतलब तोड़ना, जोड़ का मतलब बराबरी और तोड़ का मतलब तोल होता है। तोल का लकार ड़कार में बदला है। मतलब है बराबरी का वजन, या मुकाबले का ।

मुझे पक्का भरासा है कि वजन का मतलब आप नहीं जानते होंगे क्योंकि जानने से पहले मैं भी नहीं जानता था। जानने का मतलब सामने खड़े होने से तो है नही, नहीं तो लोग किसी अपरिचित की ओर इशारा करके यह न पूछते कि ‘आप इन्हें जानते है?’ और उसे साक्षात खड़ा देख कर भी आप ‘नहीं’ नहीं कहते। जानने का मतलब है रामकहानी जानना। वह आप नहीं जानते। तो जानने का मतलब यह कि वजन का मतलब भार नहीं होता। तौल हो सकता है। वजन के पिता वैदिक के वस्न हैं। उनके पिता ‘बसन’ या ‘बसना’ हैं जिसका सही अर्थ केवल भोजपुरी बोलने वाले जानते है गो आजकल वे भी बसना को बरतन कहने लगे है पर यह नही जानते बरतना, व्यवहार करना, जिसका एक अर्थ बांटना और लेन-देन या व्यापार, (तेलुगु वर्तकुडु,వర్తకుడు वैश्युडु. तमिल: वणिगन्. मलयालम: वैश्यन्, व्यापारि. कन्नड: व्यापारि ) है। बसना या पात्र विविध मापों के लिए काम में आते थे इसलिए उनका एक निश्चित मान होता था। ऐसा सर्वत्र था इसलिए आज भी गैलन, बोतल, गिलास, कप, चम्मच का मान चलता है। पर बासन/बसना का वैदिक रूप वस्न हो गया ( भूयसा वस्नमचरत्कनीयोऽविक्रीतो अकानिषं पुनर्यन् ।) और मतलब भी बदल कर लगता है मोल हो गया। वैश्य, वेश, वेश्म, विश, वसन, और बसना की आत्मा(घेरने, समाहित करने का भाव) एक ही है, जैसे बरतना, बरताव, व्यवहार, व्यापना, व्याप्ति, व्यापार की एक है।


Bhagwan Singh
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बात बेबात
2
हमने भदेस शब्दों को ही केंद्र में रख कर बात करते है, परंतु यदि आप की समझ में इसका कारण यह लगता हो कि गांव में पैदा होने वाले पूरी जिंदगी शहर में बिताने के बाद भी गंवार ही रहते हैं, सभ्यता संस्कृति से उन्हें परहेज होता है, भदेसपन को, वह भाषा का हो या आचार का, भद्रता से ऊंचा दर्जा देते हैं और मुझ पर भी वही असर तो आप कुछ कम जानते हैं। मैं गांव के बाहर आकर भी अपने गांव में ही रहा क्योंकि लगा आधार ही कमजोर हो तो अधिरचना अपने आप धंस जाएगी।

आप इसे इस तरह समझें कि कच्चा माल ही न हो तो पकाएंगे क्या? पेड़ ही न हो तो काठ की कुर्सी कैसे बनाएंगे, जिस पर बैठ कर आप सोचने लगते हैं पेड़ कुर्सी से ही पैदा हुए थे, या अधिक से अधिक यह कि पेड़ कुर्सी बनने के लिए पैदा हुए थे। सच यह है कि कुर्सी पर बैठने के बाद आदमी के पास न समझ रह जाती है, न सभ्यता, न संस्कार न भद्रता, क्योंकि कुर्सी दिमाग पर भारी पड़ती है। कुर्सी सवार समझता है जो गंवार है वह असभ्य होता है क्योंकि सभ्यता शहर में पैदा हुई, जब कि सचाई यह है कि सभ्यता गांवों में पैदा हुई और शहर में चोर, उचक्के और लुटेरे पैदा हुए, इसलिए यहां आ कर नष्ट हो गई।

यदि विश्वास न हो तो गावों की उतनी ही बड़ी आबादी में अपराधों की संख्या का मिलान समान आबादी के किसी शहर से करके देख लें। सभ्यता जिस सभा के आचार की उपज है वह सभा गावों में ही होती थी – ग्रामसभा, पंचायत, बिरादरी पंचायत के रूप में। उसमें जिस तरह की शिष्टता का निर्वाह किया जाता है अगर उसकी शिक्षा आपकी संसद या विधानसभा के सदस्यों को मिल जाए तो देश की आधी समस्याएं तो इतने से ही हल हो जाएंगी।

मुस्कराइए नहीं, आप दोनो में फर्क कर ही नहीं पाते। सभ्य को सभी का ज्ञान और ध्यान रहता है, जब कि सिविलाइज्ड आदमी इतना स्वार्थी और अकेला होता है कि अपने पड़ोसी या बगल वाले फ्लैट के आदमी को भी नहीं पहचानता। आज जो अपने को सिविलाइज्ड देश कहते हैं उनका इतिहास देख लीजिए और उसका मिलान सफल चोरों, उचक्को, तस्करों, जलदस्युओं, पिंडारियों, ठगों और माफिया से कर लीजिए सभी का इतिहास एक जैसा मिलेगा। आप को यह पता होगा ही नहीं कि अंग्रेजों ने पिंडारियों को कैसे मात दी और ठगी प्रथा को क्यों और कैसे खत्म किया। इसे आप माफिया के गैगवार से समझ सकते थे। मुझे पूरा विश्वास है कि इसे आप समझ न सके होंगे। इतनी बात मेरे कहने से समझ सकते हैं कि गैंगवार में जो जीतता है, वह हारने वाले से शरीफ नहीं होता है और असली माफिया वही होता है। हारने वाले तो गुंडे बदमाश होते हैं। माफिया वह होता है जिसका राजसत्ता में पहुंच होती है, जिसका गॉडफादर मानवतावादी मुखौटा और कल्याणकारी जामा पहन कर निकलता है तो लोग ‘जय जगदीश हरे’ गाने लगते हैं। इन सभी कसौटियों पर कस कर देखें तो कंपनी विश्व की सबसे बड़ी, सबसे संगठित माफिया थी और उसने किसी प्रतिद्वन्द्वी को पनपने नहीं दिया। यदि इतनी संपन्नता के बाद भी सिविलाइज्ड देशों के आचरण पर गौर करें तो उन्हें सभ्य नहीं मान पाएंगे, दाऊद इब्राहीम का बड़ा बाप भले मान लें।

मेरे एस मित्र का सुझाव था कि मुझे भारत का इतिहास लिखना चाहिए। सुझाव मुझे अच्छा लगा पर उस इतिहास में जब ब्रिटिश काल को माफिया युग और जिसे आप पोस्ट इंडिपेंडेंस या स्वातंत्र्योत्तर काल कहते हैं उसे माफिया का उत्तराधिकार युग कहूंगा तो प्रकाशक नहीं मिलेंगे। सही बात को सही मानने वाले प्रकाशक हैं ही नहीं, यदि कोई सिरफिरा मिल भी गया तो उसकी छुट्टी – नेहरू का अपमान हुआ है! कांग्रेस का अपमान हुआ है! फांसी दो फांसी दो!! फांसी दो फांसी दो!! के नारों से लोगों के कान बहरे हो जाएंगे और अदालत में पेटीशन दाखिल हो जाएंगे। अदालतों के जजों ने, – वे लोएस्ट के हों या एवरेस्ट के -सभी ने जो इतिहास पढ़ा है उसमें गांधी गायब हैं। गांधी नेहरू के जाजिम दिखाई देते है जिस पर चलकर उन्होने माफिया के कान में कहा था तुम्हारा काम करने को हम हाजिर हैं। तुम घर जाओ आराम करो। ऐसी न्याय व्यवस्था का फैसला क्या होगा यह पता है। हमारी न्याय-व्यवस्था माफिया तंत्र की वारिस है, उसे बचाती आई है, उसे बचाटी रहेगी । मैं जो लिखता हूं उसका अंजाम जानता हूं, पर उस प्रकाशक की रक्षा के लिए ‘इतिहास ही लिखना है, मै इतिहास लिखूंगा’, का इरादा होते हुए भी वह इतिहास न लिख सका, सिर्फ इशारों में बातें करता रहा।

अब तक आपकी समझ में आ गया होगा कि गांव का आदमी गंवार होता है जब कि शहर का गावदी होता है। वह यह भी नहीं समझ पाता कि मानक भाषाएं तो गंवारों की बोली की औलाद हैं।

सभा और सिटी में जो अंतर है वही सभ्यता और सिविलाइजेशन में होता है। सिटी को हम नगर कहते हैं और शहरी को नागर जिसके साथ एक ही पूर्वपद शोभा पाता है – नट जो खटने वालों को नटखट बना देता है, नागर लोगों को मनचला या नटनागर और जिसका प्रतिनिधित्व नटवरलाल करते हैं। पर इतना समझाने के बाद भी आप को नट का मतलब समझ में न आया होगा, इसके क्रिया रूप ‘नटना’ का भी नहीं, क्योंकि आप को यह पता नहीं कि नट का मूल संदिग्ध है। जानकार लोग यहसुझा सकते हैं कि नट नृत और नृत्य का तदभव है, पर सवाल करें कि नाटक और नाट्यशास्त्र को क्या नृत्य और नृत्यशास्त्र कहा जा सकता है। नहीं, आप भी कहेगे और मैं भी। अब आपका पाला ऐसे ज्ञानियों से पड़ेगा जो कहेंगे यह द्रविड़ मूल का शब्द है – नट/नड- चलना, नटप्पु – आवागमन, नडमाटुृ – चलना फिरना, और आपको अब यह समझ में आ गया होगा कि नटना – पलटना का द्योतक क्यों हैं? पर यदि आप कोशों पर भरोसा करते हों तो फिर धोखा खा जाएंगे। कोश का संपादन करने वालों को भाषा के मर्म का पता न था । उन्होंने परिश्रम अपनी जरूरत के अनुसार किया औरअनुकरणीय किया पर भारत की बोलियों का ज्ञान बोली क्षेत्र बदलते ही इतना कठिन हो जाता है कि हम उन्हें समझ लेने पर भी उनको जानते नहीं हैं, फिर इसकी आशा विदेशियों से करना जिनके अपने इरादे भी रहे हों उचित नहीं। लानत हमारे ऊपर है कि हमने उसे निखोट नहीं बनाया। नतीजा यह कि शब्द-अर्थ शृंखला में एक पाले में रहते हैं और फिर दूसरे में जाकर आर्य-द्रविड करते रहते हैं। नट का अर्थ चलना करने वालों के नट दिखाई देता है, नत, गत, नाता-गोता, नति (उन्नति, अवनति, उद्गति, प्रगति) के आंतरिक तर्क समझ नहीं आते। अब सवाल यह है कि नत-नट, नद-नड. नाद-नाड और (नाटियाल, नाडर, नाडार, नानदेर, नन्दिग्राम जैसे उपनामों में कोई आंतरिक संबंध है। मैं जानता हूं आप कोरे हैं पर मेरी हालत भी वही है। एकअंतर अवश्य है कि मैं मानता हूं, अब तक जो हुआ वह जहां सही लगता है वहां भी सतही है, आप कहते हैं जो दूसरों ने अपने इरादे से किया वह हमारे लिए काफी है। मैं बौद्धिक माफिया तंत्र से बाहर निकलने और निकालने के लिए प्रयत्नशील हूं, आप कहते हैं इतनी झंझट क्यों मोल ले, माफिया को उसकी फीस चुका कर अपना कारोबार करना फायदे का है।

Bhagwan Singh
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पता नहीं है गलत क्या है और सही क्या है
शब्द-विचार में हास परिहास के लिए जगह नहीं। वैयाकरण वैसे ही सूखे दिमाग के होते है। दोष उनका नहीं है। शब्द साधना ऐसा तप है कि साधक सूखकर हड्डी का ढांचा मात्र रह जाए परंतु साधना कभी पूरी नहीं होती। इस संकट को जिस व्यक्ति ने वाणी दी थी उसके विषय में कहा जाता है कि वह शब्द साधना ही नहीं करता रहा अपितु योग की साधना भी करता रहा। योग की साधना से उसे सिद्धि मिल गई होती तो उसे पुष्यमित्र शुंग का पुरोहित न बनना पड़ा होता। शब्द साधना से उसे जो कुछ मिला उसी के लिए मुख्यतः उसको याद किया जाता है, परंतु सोचिए, मिला भी क्या। उसने कहा पूरी भाषा तो दूर एक शब्द का भी अगर सम्यक ज्ञान हो जाए तो लोक में जो भी चाहें मिल जाए और परलोक में भी जो चाहे मिल जाए। उसकी बात पर बहुत से लोग भरोसा नहीं करेंगे, लेकिन सिर्फ उसके नाम और योग का इस्तेमाल करने से ही आज जिन लोगों को अकूत लाभ हुआ है वे तो इससे इनकार नहीं कर सकते।

खैर मैं कहना यह चाहता था इतनी कड़ी साधना के बाद यदि शरीर सूखकर कांटा न हो जाए, स्वभाव कांटे जैसा चुभने वाला न हो जाए, तो ही हैरानी की बात होगी। जाहिर है हजार बिच्छू मरते हैं तो एक वैयाकरण पैदा होता है। आपको लगेगा कि मैं बिच्छू से तुलना करके व्याकरण लिखने वालों की तोहीन कर रहा हूं, क्योंकि आपकी नजर में बिच्छू का डंक ही आता है। समझ यह नहीं आता कि बिच्छू किसी को डंक नहीं मारता । अपनी सुरक्षा के लिए थोड़ा सा जो विष है जिसे उसने बड़ी मुश्किल से अपनी सुरक्षा के लिए बचा रखा है, उसे बचाना चाहता है। उसे जिस जिस को डंक मार कर खर्च कर देगी तो उसका जीवन संकट में पड़ जाएगा। इसलिए लोग हैं जो डंक मरवाने के लिए बिच्छू को छेड़ते हैं। उसका अपना स्वभाव तो उस त्याग में है जिसमें वह अपना जीवन अपनी जाति और भावी पीढियों के लिए उत्सर्ग कर देती है।

वैयाकरण आपको बोलने से नहीं रोकता है। सच्चाई तो यह है कि मातृभाषा का व्याकरण होता ही नहीं। बच्चा जैसे अपनी मां का दूध पीता है, वैसे ही अपने परिवेश से और सबसे पहले अपनी मां से अपनी भाषा सीखता है। भाषा मां के दूध में मिली रहती है और मां का दूध छूटने तक बच्चे को भाषा की प्रकृति पर इतना अच्छा अधिकार हो चुका होता है कि इसके बाद उसे दुनिया की तमाम चीजों को

देखना और उनके नामों से जानना होता है परंतु इसके लिए कभी व्याकरण सीखना नहीं पड़ता है। इसकी समझ होती तो जेनेरेटिव ग्रामर की कसरत न करनी पड़ी होती।
वैयाकरण दूधिया भाषा के नियमों को भी लोक व्यवहार से ही समझते हैं और उनको नियमों में बांधते हैं, जिनसे वे लोग जो किसी दूसरी भाषा के क्षेत्र से आए हैं, उस भाषा में अपनी बात सही सही रख सकें। वैयाकरण डंक भी मार कर उनकी मदद करता है जैस वकील अदालत में अपने मुअक्किल को अपने सिखाएं हुए बयान से भटकते देखकर चुपके से चिउंटी काटता है। वह बोलने की पूरी आजादी देता है परंतु आपको अपना ही अनर्थ करने से बचाता है। छेड़ता तभी है जब आप अपनी बात सही-सही नहीं रख पाते । वैयाकरण का डंक डॉक्टर की सुई और शल्य चिकित्सक की छुरी जैसा परदुक्ख-निवारक होता है। परंतु भाषा के मामले में है आदमी आजीवन बच्चा ही रह जाता है और बच्चे जिस तरह डॉक्टर की सुई और शल्य चिकित्सक की छुरी देखकर डरते हैं वैसे ही वह वैयाकरण से डरता है।

दुनिया में किसी भी देश की संपर्क भाषा उसकी बोलचाल की भाषा नही होती है, मातृभाषा नहीं होती है। मातृभाषाएं पूरी दुनिया में बहुत थोड़ी थोड़ी दूरी के बाद बदलती रहती हैं। पारस्परिकता के क्षेत्र एकरूपता और बोधगम्यता और उच्चतर साहित्य और दार्शनिक व व्यापारिक व्यवहार के लिए उनका एक बहुग्राह्य रूप तैयार होता है। संस्कृत इसी तरह एक व्यापक क्षेत्र के लिए विकसित बहुग्राह भाषा थी। इसका भी विकास आपसी लेन-देन ने किया था, वैयाकरणों ने नहीं, ब्राह्मणों ने भी नहीं।

परंतु दुनिया के किसी देश में, किसी ने, दूसरों को बहुग्राह्य भाषा को बोलने से वंचित करके, उस पर एकाधिकार नहीं जमाया जैसा भारत में ब्राह्मणों ने किया। ब्राह्मणों ने भाषाज्ञान को, ठीक उसी तरह से अपने एकाधिकार में क्यों कर लिया जैसे भारत पर आक्रमण करने वालों और अपने आक्रमण को स्थाई बनाने वालों ने तरह-तरह के तरीके निकलते हुए किया।

अपने ही समाज से ब्राह्मणों ने दुश्मनों जैसा व्यवहार क्यों किया कि स्वयं उस भाषा से वंचित हो जाएं और उसे सीखने के लिए उन्हें अपनी जिंदगी लगा देनी पड़े और ज्ञानी कहाने के बाद भी उसमें जड़ ही पैदा हों और ज्ञानी दुर्लभ हो जाए।

Bhagwan Singh
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बात वे बात(4)
यदि आप पूछें, ‘भदेस भाषा क्या है?’ तो मेरा उत्तर होगा, ’भाषा की पूर्णता।’ शिष्ट भाषा क्या है? उस पूर्ण में से उसअंश को अलग कर देना, जो हमारे धर्म, विश्वास, रीति, नीति, व्यवहार और आदर्श के की जरूरत नहीं हैं। यह है, अविकल को विकल कर देना, सांग को पंगु बना देना।

पूर्णता केवल प्रकृति में है। संस्कृति तो प्रकृति के किसी एक अंश की तलाश या विनाश है जिसके लिए हमें प्रकृति को काट, तराश, तपा-गला या मिटा कर केवल उतना अंश पाना या बचाना होता है जिसकी हमें चाह है। उसमें पूर्णता हो ही नहीं सकती। एक प्रतिमा शिला का क्षय है, कलाकार की आकांक्षा की पूर्ति है, पर पूर्ति पूर्णता नही है। प्रतिमा से और कुछ नहीं बनाया जा सकता, शिला तो यह बन ही नहीं सकती, न बनना चाहेगी। टूट सकती है, तोड़ी जा सकती और धूल में मिलाया जा सकता है, पर धूल तो प्रकृति का हिस्सा है, एक बार प्र-कृति से कृति बन जाने के बाद उसकी सभी संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं। धूल बनने तक की। केवल शिला में वे अनंत संभावनाएं थीं जिनमें से कुछ का उपयोग, – कई रूपों में ,मनुष्य भी कर सकता था – दुर्ग बनाना, स्तंभ बनाना, अमरलेख अर्थात् शिलालेख बनाना, वास्तुकृतियां बनाना, प्रतिमाएं और यहां तक कि ध्वंस के गोले और खेल की गोली कुछ भी बनाना – परंतु एक रूप में ढल जाने के बाद उसकी दूसरी संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं। इनमें से कुछ भी बनने के बाद कृति धूल तक नहीं बन सकती जो प्राकृतिक

गतिविधियों की ही परिणति औरइसलिए उसी का अंग है। वह धूल का इस्तेमाल अनगिनत रूपों में अवश्य कर सकता है अपनी जरूरतों के अनुसार।
पूर्ण से निकला पूर्ण नहीं हो सकता पूर्ण में मिल भी नहीं सकता इसलिए मुझे ईशावास्योपनिषद् के कथन – ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ पर पुनर्विचार करने कीआवश्यकता अनुभव होती है। जो लोग मानते हैं कि हम या हमारे पूर्वज जिन सत्यों पर पहुंच गए थे उन पर सोच विचार भी नहीं किया जाता,, वहीं अंतिम सत्य है, वे तो अपनी इस मान्यता के कारण विचार परिधि से स्वेच्छा से बाहर जा चुके हैं। पर आपको समझना है कि सोचना नकारना नहीं है; बिना सोचे विचारे स्वीकारना भी नहीं है।

पूर्ब और पश्चिम में एक अंतर है – परिवेश का अंतर। प्राकृतिक उदारता और कृपणता का अंतर। अनुदार प्राकृतिक परिवेश के लोग उदार प्राकृतिक परिवेश में जीनो वालों की तुलना में अधिक यथार्थवादी रहे हैं क्योंकि उनकी प्रकृति और परिवेश उन्हें विवश करता था, कि वे सच्चाई को अधिक गहनता से जाने और अपने जीवन की संभावनाएं उनके बीच में तलाश करें।

परंतु यह भी एक सरलीकरण है। यदि ऐसा होता तो साइबेरिया के लोग ज्ञान विज्ञान में सर्वोपरि होते। अपनी परिस्थितियों में जीवित रहने का तरीका उन्होंने अवश्य निकाला था जो किसी दूसरे के बस का नहीं था, परंतु उनका तरीका सार्वजनीन नहीं था, उसको सभ्यता की बुनियाद का आधार नहीं बनाया जा सकता।

मैं इस गणित से आध्यात्मिक रूप में सहमत हो सकता हूं कि यदि हम शून्य, अनस्तित्व को पूर्णता मान लें तो पूर्णता, से पूर्णता निकलने के बाद भी पूर्णता बनी रहेगी। सत्ता बनते ही विनाश का पर्याय बन जाएगी। हम प्रकृति कि अपनी स्वायत्तता को पूर्णता और उससे विच्छेद को कृति और संस्कृति और संस्कृत का रूप मानते हैं।

इसी संदर्भ में मुझे वे बोलियां जिनको हम भदेस मानते हैं, प्रकृति के अधिक निकट होने के कारण, संस्कृत या किसी भी विशेष प्रयोजन से काम में लाई जाने वाली भाषा की तुलना में अधिक समर्थ और समृद्ध प्रतीत होती हैं। शिक्षा के लिए प्रयोग में आने वाली भाषाएं, उन्हें शिष्ट कहें, विशिष्ट कहेंं, सिद्ध कहें या संस्कृत कहें उनके प्रति किसी अनादर के बिना यह मानना होगा कि, भदेस मानी जाने वाली बोलियां, मूल प्रकृति के निकट होने के कारण उसी तरह रक्षा के योग्य भी हैं, वंदना के योग्य भी हैं, जैसे हमारी प्रकृति जिसे हम अपने अहंकार में नष्ट करते जा रहे हैं। हमारी जरूरतों के अनुसार, उसी प्रकृति या भदेश भाषा से जो जो कुछ निकाला गया है, और उसके बल पर जो कुछ गढ़ा गया हो – साहित्य के लिए हो, ज्ञान के लिए हो, विज्ञान के लिए हो – उसका सम्मान तो करना ही होगा। ध्यान केवल इसका रखना होगा कि वे एक दूसरे को नष्ट न करते विकसित हों अपने प्राकृतिक रूप को बनाए भी रहें।

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