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अब चीन अरुणाँचल, लद्दाख, अक्साई चिन से कब्ज़ा छोड़ भागेगा, पाकिस्तान भी PoK छोड़ देगा और अमेरिका तो पैंट मे ही मूत रहा है!

 

जे.सी. पब्लिकेशन्स ने प्रकाशित किया पैगंबर-ए-इस्लाम का कार्टून, पर्सनल लाॅ बोर्ड ने की सख्त कार्रावाई की मांग

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव हज़रत मौलाना ख़ालिद सैफ़ुल्लाह रहमानी ने अपने प्रेस बयान में बताया कि जे.सी. पब्लिकेशन्स दिल्ली ने आईसीएससी बोर्ड की सातवीं कक्षा की इतिहास से सम्बंधित पाठ्य पुस्तक में पैग़म्बर-ए-इस्लाम और हज़रत जिब्रईल अलैह सलाम पर कार्टून शामिल किया है।

मौलाना रहमानी ने इसकी कड़ी निन्दा की है, उन्होंने अपने बयान में कहा कि हर मुसलमान अपने नबी (सन्देष्टा) को अपनी जान, अपने माँ-बाप और अपनी सन्तान से भी ज़्यादा प्रेम करता है, वह आप ﷺ की शान में छोटी सी भी निन्दा सहन नहीं कर सकता, और पैग़म्बर-ए-इस्लाम की काल्पनिक छवि या कार्टून बनाना भी आप ﷺ के अपमान की श्रेणी में आता है, इसलिए सरकार को चाहिए कि तत्काल प्रभाव से उस पुस्तक पर प्रतिबंध लगाए, उसकी कृतियों को ज़ब्त करे और लेखक व प्रकाशक के विरुद्ध उचित क़ानूनी कार्यवाही करे।

उन्होंने दिलाया है कि पिछले दिनों कानपुर में आयोजित होने वाली बोर्ड की सत्ताइसवीं बैठक में सरकार से मांग की गयी थी कि वह धर्मों की आस्थाओं के प्रतीकों अथवा पवित्र व्यक्तित्वों के अपमान से सम्बंधित प्रभावी क़ानून बनाए और उसको कड़ाई के साथ लागू करे, बोर्ड दुबारा अपनी माँग को दोहराना चाहता है और स्पष्ट करता है कि बोर्ड सभी धर्मों को आस्थाओं के प्रतीकों अथवा पवित्र व्यक्तित्वों के अपमान को जुर्म मानता है क्योंकि इससे जनता के एक बड़े वर्ग में द्वेष उत्पन्न होता है।


MSK Lucknow
@LucknowMsk
अब कल चीन अरुणाँचल, लद्दाख, अक्साई चिन सहित सारा कब्जा छोड़ भागेगा, पाकिस्तान भी POK छोड़ देगा

Shubham Singh Yadav
@ShubhamSinghOn2
और अमेरिका तो पैंट मे ही मूत रहा है

ANI_HindiNews
@AHindinews
मुझे भारत का दौरा करके बहुत खुशी हो रही है। पिछले साल दोनों देशों के बीच ट्रेड में 17% की गिरावट हुई थी परन्तु इस साल पहले 9 महीनों में ट्रेड में 38% की बढ़ोतरी देखी गई है: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

Press Trust of India
@PTI_News
There is no change in pace of relations between India and Russia despite COVID-19: PM Modi in talks with President Putin

Manoj Yadav ‏منوج یادو
@SirManojYadav
पकिस्तान में श्रीलंकाई नागरिक की भीड़ द्वारा हत्या के मामले में अब तक 118 लोग गिरफ्तार किए गए जिनमें 13 प्रमुख संदिग्ध शामिल हैं.. 800 लोगों पर टेररिज़्म क़ानून के तहत मामला दर्ज किया गया ..ख़ुद पीएम ने इस घटना को देश के लिए शर्मनाक बताया और माफ़ी माँगी..
भारत में ये मुमकिन है??

Hemant Rajaura
@hemantrajora_
Sad News : This lady is no more. She has died while way back to home as strike continues in Hospital.

दुखद : इस महिला की अब मौत हो गई। सफदरजंग में जमीन पर पड़ी थीं। हमने मदद की कोशिश की लेकिन अस्पताल के अधिकारियों ने न फोन उठाया और न मिलने को तैयार हुए।


Abu Asim Azmi
@abuasimazmi
आज के दिन फिरकापरस्तों की घिनौनी राजनीती की वजह से हमारी बाबरी मस्जिद शहीद की गई थी। आज भी उसके जिम्मेदार आजाद घूम रहे हैं, अगर मस्जिद की जगह पर कोर्ट राम मंदिर के हक़ में फैसला दे सकता है तो हम उम्मीद करते हैं कि मस्जिद शहीद करने वालों को कड़ी सज़ा ज़रूर मिलेगी, इन शा अल्लाह।

DR. MANMOHAN SINGH (Parody)
@PMdrmanmohan
RSS द्वारा खिलाई गई धार्मिक अफीम वाली भीड़ और लालकृष्ण आडवाणी और उनके जैसे नेतृत्व ने 1992 में इसी दिन भारत के सांप्रदायिक सद्भाव को ध्वस्त कर दिया था।

6 दिसंबर भारतीय इतिहास का एक काला दिन है, जिसने देश का सांस्कृतिक और सांप्रदायिक माहौल खराब किया।

यह कैसी व्यस्तता

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

यह कैसी व्यस्तता है कि किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है। इस भोगवादी और भौतिक संस्कृति ने बहुत नजदीकी और संवेदनशील संबंधों को भी मोबाइल के इस युग में इतना यथार्थवादी बना दिया है कि वे घर में भी एक-दूसरे को मुश्किल से समय दे पाते हैं। यह भी मुमकिन है कि वे एक-दूसरे से मोबाइल पर ही बात करते हों।

हम जब भी अपने करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलते हैं, तो यही गिला करते हैं कि जीवन की आपाधापी में संपर्क करने का समय ही नहीं मिल पाता। मानते भी हैं कि अधिकतर समय फोन पर या टीवी देखने में चला जाता है। हम अपने बच्चों को भी समय नहीं दे पाते, क्योंकि हमारी तरह उनकी भी अपनी दुनिया और समय चक्र है। आप समय का अभाव कहें, व्यस्तता या फुर्सत न मिलने की शिकायत करें, सार यही है कि जिंदगी मशीनी हो गई है और बतियाने का समय नहीं मिल पाता। यहां तक कि अखबार पढ़ने के लिए भी समय नहीं मिल पाता। खबरें मोबाइल पर मिल जाती हैं।

समय के साथ चीजें, आदतें बदलती हैं और शौक भी बदलते हैं। कभी आपसी बातचीत का अपना सुख होता था। लोग घंटों चबूतरों पर बैठ कर बतरस का आनंद लेते थे। अब वह बात नहीं रही। लोग धीरे-धीरे गल्प विधा को भी भूलते जा रहे हैं। अस्सी के दशक तक लोग कविता, शायरी, संगीत और नाटकों का घंटों लुत्फ उठाते थे। धीरे-धीरे कुछ तो इनका चलन कम हुआ और कुछ श्रोता और दर्शकों की घटती संख्या भी इन आयोजनों की कमी का कारण रही। अब तो लोगों के पास इन गतिविधियों के लिए समय ही नहीं है।

कारण वही है कि उनके पास फुर्सत ही कहां है! मनोरंजन के अन्य साधन जुट गए हैं, पुराने शौक कम हो गए हैं। अब न कला संस्कृति के लिए समय है, न मिलने-जुलने के लिए और न ही अपने लिए समय है। कठपुतली का नाच, रामायण का मंचन, स्तरीय वाद-विवाद और परिसंवाद अतीत की बातें हो गई हैं। जन भागीदारी का अभाव इसकी प्रमुख वजह है। प्रोत्साहन के अभाव और प्रचार-प्रसार की कमी के कारण इन विधाओं को नई पीढ़ी भूलती जा रही है।

न तो हमारे पास अपनी विरासत को संभालने का समय है और न ही विरासत को नई पीढ़ी के हाथ सौंपने का। नतीजतन अस्सी-नब्बे के दशक तक तो यह गनीमत थी कि लोग कुंदनलाल सहगल और बाबा सहगल का नाम जानते थे। आज के लोग उन्हें नहीं जानते। वे न तो बेगम अख्तर को जानते हैं और न ही मेहदी हसन, तलत महमूद और मास्टर मदन को। यह केवल आज की समस्या नहीं है। अस्सी के दशक में राजसिंह डूंगरपुर के साथ उनकी कार में उनका साक्षात्कार लेने के लिए पूना जा रहे एक खेल पत्रकार ने जब कार में लता मंगेशकर का गाना सुन कर पूछा कि यह किसकी आवाज है, तो राजसिंह ने गुस्से में तुरंत अपने ड्राइवर से कार रोकने और उस पत्रकार को नीचे उतरने की हिदायत दी।

बरसों से अपने बाबा-दादी से नहीं मिले, छात्रावास में रह रहे बच्चे घर आने पर अगर पूछें कि ये दो बुजुर्ग कौन हैं, तो भला उनका क्या कसूर है? हमें कभी उन्हें मिलाने के लिए समय ही नहीं मिला। पाश्चात्य संगीत में रमने वाले अगर लता, रफी, मुकेश, भीमसेन जोशी और पंडित जसराज का नाम न जानें और न ही उनका संगीत समझें, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

हम वर्तमान में रहें, पर यह न भूलें कि अतीत ने ही हमें इस मुकाम पर पहुंचाया है। समय के अभाव के बावजूद हमें समस्त व्यस्तताओं में से कुछ समय निकालना होगा। यह तालमेल ही हमें सुरक्षित और जागरूक बनाए रखेगा। नया रिकार्ड बनाने का यह मतलब नहीं है कि पुराने रिकार्ड को मिटा दिया जाए। उसका उल्लेख तो होगा ही, भले ही वह संदर्भ के लिए हो।

कवि को कविता लिखने का, गायक को गाने और चित्रकार को चित्र बनाने का समय न मिले तो यह स्थिति बड़ी त्रासद होगी। जो विधा हमारे जीवन से घुल-मिल गई है और जीवन का अंग बन चुकी है, उसके बिना जीवन की कल्पना ही कैसे की जा सकती है। ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो बरसों से एक-दूसरे से मिलने का समय नहीं निकाल पाए और ऐसे लोगों को एक-दूसरे के लिए समय न निकाल पाने की शिकायत है। पर मिलने की पहल कोई नहीं करता।

मिलने पर भी न मिल पाने का शिकवा। बातचीत नहीं। क्या हमारे पास कहने-सुनने को कुछ है ही नहीं? एक शेर याद आता है जिसमें इसी स्थिति की बात की गई है- ‘तुम्हें गैरों से कब फुर्सत, हम अपने ग्राम से कब खाली/ चलो बस हो गया मिलना, न तुम खाली न हम खाली।’ अच्छा यही होगा कि हम सचेत और सजग रहें, मिलते-जुलते और बतियाते रहें।

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