धर्म

तसवूफ़ एक बदनाम लफ़्ज़ होकर रह गया है….तसवूफ़ क्या है? : Part-4

Razi Chishti
======================
·
(4)
नबी करीम saw फ़रमाते हैं कि अगर कोई शख़्स यह गवाही देता है कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं है और मुहम्मद saw अल्लाह के रसूल हैं, और नमाज़, रोज़ा, हज व ज़कात के अरकान पर पाबंदी से अमल पैरा है तो वह इस्लाम पर है और सूरह हुजरात की आयत न. 14 के मुताबिक़ वो अभी इस्लाम लाया है, ईमान तो उसके दिल में अभी दाख़िल नहीं हुआ है. आयत मजकूर से वाज़ह है की दीन अभी मोकम्मल नहीं हुआ अभी तो ईमान का दिल में उतरना बाक़ी है. अर्थात अभी इस्लाम से ईमान तक का सफ़र होना है.

नबी करीम saw फरमाते हैं कि “ईमान ज़ुबान से इक़रार करने और दिल से पहचानने का नाम है” (इबने माजा फ़ी सनन 20-1, नंबर 65). जबतक दिल अल्लाह swt की ज़ात की तसदीक़ न करले ईमान कामिल नहीं है. और जब ईमान कामिल हो जाता है तो अल्लाह swt उस शख़्स से फ़रमा रहा कि;

“मोमिनो! दाख़िल ही जाओ पूरे पूरे इस्लाम में और शैतान कि इत्तबा न करना”(2:208). आयत मजकूर से यह वाज़ह हुआ कि अभी ईमान से पूरे पुरे इस्लाम मे दाख़िल होने तक का सफ़र बाक़ी है. यहाँ पर कई नुकात हैं जिनको समझना है मसलन दिलसे पहचानना क्या है? किसको पहचानना है? और पहचानने का तरीक़ा क्या है, सूरह हुजरात में जिस इस्लाम का ज़िक्र है वो क्या है? और सूरह बकरा में जो पूरा इस्लाम का ज़िक्र है वो क्या है? सूरह हुजरात में मुसलमानों से नहीं कहा गया कि वो शैतान कि इत्तबा न करें मगर मोमिनों से फ़रमाया जरहा है कि वो शैतान की इत्तबा न करें. शैतान का वो कौन सा अमल है जिसकी इत्तबा मना है? यह सारे सबक मदरसों के नेसाब में नहीं हैं. यह सब तसवूफ़ के मदरसों में सिखाया जाता है.

लेकिन मज़ारों पर होने वाले रसुमात जो शिर्क ओ बिदत की तरफ़ लेजाते हैं, और वहाँ पर मुजाविर लोगों से ज़बरदस्ती वसूली करते हैं, इन सबने बहुत से लोगों को तसवूफ़ से दूर कर दिया और इससे भी ज़्यादा लोगों को इस से चिढ़ हो गई. नतीजा यह हुआ कि मज़ारों पर जाने वाले ख़ुद एक फिरक़ा बन गए. —-to be continued