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मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत की राजनीति को मज़बूत किया जा रहा है, देश का क़ानून किसी भी संपत्ति पर बुलडोज़र चलाने की अनुमति नहीं देता है : रिपोर्ट

बुलडोज़र का अविष्कार क़रीब सौ साल पहले हुआ था और तब से ही इनका इस्तेमाल घरों, दफ़्तरों, सड़कों और इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में होता रहा है.

लेकिन हाल के सालों में, कई लोगों का ये कहना है कि, ये भारत की हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के हाथों में एक हथियार बन गए हैं जिनका इस्तेमाल अल्पसंख्यक मुसलमानों के घरों, दुकानों और संपत्तियों को तोड़ने के लिए किया जा रहा है.

ये बुलडोज़र राजनीतिक रूप से अहम राज्य उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक नज़र आ रहे हैं.

इनका सबसे ताज़ा कारनामा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) में नज़र आया जहां बीते रविवार को राजनीतिक कार्यकर्ता जावेद मोहम्मद का घर तोड़ दिया गया. आरोप लगाया गया कि ये घर अवैध रूप से बनाया गया था. हालांकि परिवार ने इस आरोप को ख़ारिज किया है.

आलोचकों का कहना है कि घर तोड़ने के वास्तविक कारण का इमारत के निर्माण के कथित रूप से अवैध होने से कोई लेना देना नहीं है बल्कि जावेद के परिवार को उनके सरकार का मुखर आलोचक होने की सज़ा दी गई है.

घर ढहाने से एक दिन पहले ही पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार किया था और उन पर प्रयागराज में पैगंबर मोहम्मद के अपमान के ख़िलाफ़ हुए हिंसक प्रदर्शन का ‘मास्टरमाइंड’ होने का आरोप लगाया गया था.

‘क़ानून की मूल भावना ही बुलडोज़र से ध्वस्त’
भारत में मुसलमान बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के पैगंबर मोहम्मद को लेकर दिए गए विवादन बयान से आक्रोशित हैं और बीते शुक्रवार को देश के कई शहरों में इसके ख़िलाफ़ व्यापक प्रदर्शन हुए थे. भाजपा ने नूपुर शर्मा को पार्टी से निकाल दिया है लेकिन प्रदर्शनकारी उनकी गिरफ़्तारी की मांग कर रहे थे.

बीजेपी नेताओं ने जावेद और प्रदर्शन में शामिल रहे उन जैसे ही दूसरे लोगों के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाइयों का बचाव करते हुए कहा है कि “इसमें कुछ भी ग़ैर क़ानूनी नहीं है.”

लेकिन ध्वस्त की इन कार्रवाइयों, जिनकी तुलना इसराइल के भारी मशीनरी से फ़लस्तीनी घर तोड़ने से की जा रही है, कि भारत में आलोचना हो रही है और दुनियाभर में चर्चा भी हो रही है. आलोचकों का कहना है कि “इस आधिकरिक कार्रवाई पर वैधता का बेहद बारीक़ लिबास चढ़ा है” और अधिकारी “क़ानून की मूल भावना को ही बुलडोज़र से ध्वस्त कर रहे हैं.”

एक दुर्लभ क़दम उठाते हुए कई चर्चित पूर्व जजों और वकीलों ने देश के सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा है और कहा है कि “बुलडोज़र क़ानून के शासन का अस्वीकार्य दमन हैं.” इस पत्र में अदालत से “मुसलमानों के दमन और उनके ख़िलाफ़ हिंसा” को रोकने का आग्रह भी किया गया है.

इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में लिखे एक तीखे लेख में पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने लिखा, “बुलडोज़र को अवैध ढांचों से कोई मतलब नहीं है, उसे मतलब है कि मैं कौन हूं और मैं किस पक्ष में खड़ा हूं.”

“इसे मैं सार्वजिक रूप से क्या बोलता हूं उससे मतलब है, इसे मेरी मान्यताओं से मतलब है, मेरे समुदाय से मतलब है. मेरे होने और मेरे धर्म से मतलब है. इसे मेरी विद्रोही आवाज़ से मतलब है. जब एक बुलडोज़र मेरे घर को ज़मींदोज़ करता है तो वो ना सिर्फ उस ढांचे को गिराता है जो मैंने बनाया बल्कि वो मेरी बोलने की हिम्मत को भी तोड़ता है.”

अदालत क्या कह रही है?
बुलडोज़र के इस्तेमाल को भारत की शीर्ष अदालत में भी चुनौती दी गई है. अदालत ने कहा है कि “इनका इस्तेमाल क़ानून के दायरे में होना चाहिए और बदले के लिए नहीं होना चाहिए.”

बुलडोज़र से जो ख़तरा पैदा हुआ है वो अभी ही सामने नहीं आया है.

इसी साल जब मैं उत्तर प्रदेश में विधानस सभा चुनाव की कवरेज कर रही थी तो मैंने एक रोचक दृश्य देखा. योगी आदित्यनाथ के एक रोड शो में उनके समर्थक छोटे-छोटे खिलौना बुलडोज़र लेकर पहुंचे थे. योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बनने के लिए मैदान में थे और चुनाव जीतकर फिर से मुख्यमंत्री बन भी गए हैं.

हाथ में प्लास्टिक के बुलडोज़र लिए योगी आदित्यनाथ के समर्थक टीवी कैमरों के सामने नाच रहे थे और गीत गा रहे थे ‘वो बुलडोज़र वाला बाबा फिर से आएगा.’

योगी आदित्यनाथ को स्थानीय मीडिया ने बुलडोज़र बाबा का नाम दिया था लेकिन उनके विपक्षी अखिलेश यादव ने भी इसका इस्तेमाल किया तो ये नाम उनके साथ जुड़ गया.

अखिलेश यादव ने इसका इस्तेमाल उपहास के तौर पर किया था लेकिन वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, “बीजेपी ने इसका भी फ़ायदा उठाया क्योंकि ये उनकी एक ताक़तवर नेता की छवि को और मज़बूत करता है.”

कई शहरों में योगी आदित्यनाथ की रैलियों के दौरान बुलडोज़र खड़े किए गए और जब उन्होंने चुनाव जीता तो विधानसभा भवन के बाहर बुलडोज़र की परेड भी निकाली गई.

आलोचनाओं को दबाने के लिए इस्तेमाल
वरिष्ठ पत्रकार आलोक जोशी कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने बुलडोज़र का इस्तेमाल सबसे पहले अपराधी विकास दुबे के ख़िलाफ़ किया था. उन पर आठ पुलिसवालों की हत्या के आरोप थे. इसके बाद गैंगस्टर-राजनेता मुख़्तार अंसारी के ख़िलाफ़ बुलडोज़र का इस्तेमाल किया गया.

इनकी संपत्तियों को तोड़े जाने के वीडियो नेशनल टीवी चैनलों पर चले थे और सरकार को इनसे “अपराधियों के ख़िलाफ़ मज़बूती से खड़े होने के लिए” जनता का समर्थन और वाहवाही भी मिली.

जोशी कहते हैं, “लेकिन अब इनका इस्तेमाल विपक्ष और सरकार के आलोचकों को दबाने की रणनीति के रूप में बढ़ रहा है. ख़ासकर मुसलमानों के ख़िलाफ़.”

सहारनपुर और प्रयागराज में बुलडोज़र चलाने से पहले एक बैठक की अध्यक्षता करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि अपराधियों और माफ़िया के ख़िलाफ़ बुलडोज़र चलता रहेगा.

प्रधान कहते हैं कि सरकार ने बुलडोज़र को “मज़बूत शासन के प्रतीक” से “एक हथियार में बदल दिया है, इससे क़ानून का उल्लंघन किया जा रहा है और मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत की राजनीति को मज़बूत किया जा रहा है.

“कोई लोकल गुंडा ऐसे ही बर्ताव करता है, ये उस कहावत जैसा है कि तुम मेरे ऊपर एक पत्थर तो फेंको, मैं तुम्हारा घर गिरा दूंगा. मैं तुम्हारे पूरे परिवार को सबक सिखा दूंगा.”

वो कहते हैं, “लेकिन देश का क़ानून आप को किसी भी संपत्ति पर बुलडोज़र चलाने की अनुमति नहीं देता है. यदि परिवार का कोई एक सदस्य क़त्ल करता है तो क्या आप पूरे परिवार को उसके लिए फांसी पर चढ़ा दोगे. लेकिन ये एक ऐसी सरकार है जो अभियोजक, जज, जूरी और जल्लाद, सभी की भूमिका में है.”

बुलडोज़र चलाने पर भले ही दुनियाभर में आलोचना हो रही हो, लेकिन जोशी कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ को ज़बरदस्त राजनीतिक फ़ायदा हो रहा है और हो सकता है इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी समर्थन प्राप्त हो.

पिछले साल दिसंबर में यूपी की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, “जब किसी माफ़िया पर बुलडोज़र चलता है, जब वो किसी अवैध इमारत को तोड़ता है, तो उसे सींचने वाले लोगों को भी दर्द होता है.”

प्रधानमंत्री की टिप्पणी के बाद से ही बुलडोज़र का इस्तेमाल सांप्रदायिक हिंसा के अभियुक्तों के ख़िलाफ़ होने लगा है. हाल ही में मध्य प्रदेश और राजधानी दिल्ली में बुलडोज़र चला है, इस तरह की कार्रवाई में मुसलमानों को अधिक निशाना बनाया गया है और उनके घरों, छोटी दुकानों और उद्योगों को नुक़सान पहुंचाया गया.

जोशी कहते हैं, “अदालत के किसी आदेश में कभी नहीं कहा गया कि किसी का घर तोड़ दो, भले ही उसने अपराध किया है और अदालत ने उसे दोषी ठहरा दिया हो. ऐसे में जब प्रशासन किसी के घर पर बुलडोज़र भेजता है तो इससे एक राजनीतिक संदेश दिया जाता है- हमारे ख़िलाफ़ जो खड़ा होगा, उसे ज़मींदोज़ कर दिया जाएगा.”

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गीता पांडे
बीबीसी संवाददाता