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यूक्रेनी राष्ट्रपति यहूदी है, रूसी सेना यूक्रेन को नाज़ियों से छुटकारा दिला रही है : बोरिस जॉनसन ने कहा है, ‘हमें रूस को घुटनों पर लाना है, रूसी विदेशमंत्री ने कहा, दम है तो ला कर दिखाओ’

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुए अब लगभग चार महीने बीत चुके हैं. इस बीच हज़ारों नागरिकों की मौत हो चुकी है, कई शहर पूरी तरह तबाह हो चुके हैं और करोड़ों लोग बेघर हो गए हैं.

लेकिन रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ ने बीते गुरुवार मुझे बताया है कि स्थिति वैसी नहीं है, जैसी दिख रही है.

एक बार फिर उन्होंने दावा किया कि “हमने यूक्रेन पर हमला नहीं किया है.”

उन्होंने कहा कि “हमने एक विशेष सैन्य अभियान का एलान किया क्योंकि हमारे पास पश्चिमी दुनिया को समझाने का कोई दूसरा तरीका नहीं था कि यूक्रेन को नेटो में घसीटा जाना एक आपराधिक कृत्य था.”

नाज़ियों से छुटकारा दिलाने की कोशिश
इस साल 24 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ ने पश्चिमी देशों के मीडिया संस्थानों को बहुत कम इंटरव्यू दिए हैं.

बीबीसी से बातचीत में लावरोफ़ ने युद्ध पर रूसी सरकार के रुख़ को दोहराते हुए कहा कि यूक्रेन में नाज़ी मौजूद थे.

रूसी अधिकारी अक्सर दावा करते हैं कि उनकी सेना यूक्रेन को नाज़ियों से छुटकारा दिला रही है.

हाल ही में लावरोफ़ के एक बयान ने हलचल मचा दी थी. लावरोफ़ ने यूक्रेनी राष्ट्रपति (जो कि यहूदी हैं) से जुड़ी एक नाज़ी गाली को सही ठहराने की कोशिश करते हुए अजीबोगरीब दावा किया था कि एडोल्फ़ हिटलर की रगों में “यहूदी खून” था.

‘दूध का धुला नहीं है रूस’
मैंने उन्हें यूक्रेन के चेर्निहीएव शहर के गांव यहिद्ने से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक रिपोर्ट पढ़कर सुनाई.

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि “रूस की सशस्त्र सैन्य टुकड़ी ने 28 दिनों तक 360 लोगों को एक स्कूल के बेसमेंट में रहने को मजबूर किया जिसमें 74 बच्चे और पांच विकलांग थे. यहां टॉयलेट और पानी की व्यवस्था नहीं थी. उनमें से दस लोगों की मौत हो गई थी.”

मैंने पूछा कि ये क्या “ये नाज़ियों के साथ संघर्ष था”

इस पर लावरोफ़ ने कहा, “ये दुख की बात है” लेकिन “अंतरराष्ट्रीय राजनयिकों जैसे मानवाधिकार मामलों पर यूएन हाई-कमिश्नर, यूएन महासचिव समेत अन्य यूएन प्रतिनिधियों पर पश्चिमी देशों की ओर से दबाव डाला जा रहा है और अक्सर उन्हें पश्चिमी देशों द्वारा फैलाई गई झूठी ख़बरों को तेज़ी से फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.”

72 वर्षीय लावरोफ़ ने कहा, “हम दूध के धुले नहीं हैं, लेकिन हम जो हैं, वैसा दिखाने में शर्मिंदा भी नहीं हैं.”

लावरोफ़ पर प्रतिबंध

लावरोफ़ पिछले 18 सालों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रूस का प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं. लेकिन पश्चिमी देशों ने युद्ध शुरू होने के बाद उनके और उनकी बेटी पर प्रतिबंध लगाए हैं.

अमेरिका ने लावरोफ़ पर यूक्रेन के ख़िलाफ़ उसके आक्रांता होने से जुड़ा झूठा नैरेटिव चलाने का आरोप लगाया है. इसके साथ ही अमेरिका लावरोफ़ को इस हमले के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार मानता है क्योंकि वह रूस की सुरक्षा समिति के सदस्य हैं.

इस बातचीत में मैंने ब्रिटेन के साथ रूस के रिश्तों को लेकर भी बात की. बता दें कि रूस ने ब्रिटेन को ग़ैर-दोस्ताना मुल्कों की आधिकारिक सूची में रखा हुआ है.

मैंने पूछा कि ये कहना कुछ कम नहीं होगा कि दोनों देशों के बीच रिश्ते ख़राब थे.

लावरोफ़ ने इस पर कहा, “मुझे नहीं लगता कि अब ज़्यादा कुछ किया जा सकता है. प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और विदेश मंत्री लिज़ ट्रस ने खुलकर कहा है कि हमें रूस को हराना चाहिए और उसे घुटनों पर लाना चाहिए. अगर ऐसा है तो कर के देख लीजिए.”

पिछले महीने ब्रिटेन की विदेश मंत्री लिज़ ट्रस ने कहा था कि पुतिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को शर्मिंदा कर रहे हैं और “हमें ये सुनिश्चित करना चाहिए कि यूक्रेन में उनकी हार हो.”

मैंने जब ये पूछा कि अब वह ब्रिटेन को कैसे देखते हैं तो इस पर उन्होंने कहा कि ब्रिटेन एक बार फिर “राजनीतिक महत्वाकांक्षा की ख़ातिर अपने लोगों के हितों को दांव पर लगा रहा है.”

बातचीत के दौरान मैंने रूसी विदेश मंत्री से यूक्रेन के क़ब्जे वाले इलाक़े में रूसी अलगाववादियों द्वारा दो ब्रितानी लोगों को मौत की सज़ा सुनाए जाने के बारे में पूछा.

जब मैंने उनसे कहा कि पश्चिमी देशों की नज़र में उनके साथ जो कुछ हुआ, उसके लिए रूस ज़िम्मेदार है, तो इस पर लावरोफ़ ने कहा, “मुझे इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि पश्चिमी देश क्या सोचते हैं. मेरी रुचि सिर्फ अंतरराष्ट्रीय क़ानून में है. अंतरराष्ट्रीय क़ानून के मुताबिक़, भाड़े के लड़ाके सैनिक नहीं माने जाते.”

इस पर मैंने जवाब दिया कि ये लोग भाड़े के लड़ाके नहीं थे और इन्होंने यूक्रेन की सेना में काम किया था.

इस पर लावरोफ़ ने कहा कि इसका फ़ैसला अदालत को करना चाहिए.

बीबीसी पर लगाया आरोप
इसके बाद उन्होंने बीबीसी पर आरोप लगाते हुए कहा कि पूर्वी यूक्रेन में अलगाववादियों के नियंत्रण वाले इलाक़ों में “जब आठ सालों तक यूक्रेन की सैन्य टुकड़ियां आम लोगों पर बम बरसा रही थीं, तब आम नागरिकों पर क्या बीत रही थी, वो सच सामने नहीं लाया गया.”

इसके जवाब में मैंने कहा कि बीबीसी ने छह सालों में अलगाववादियों के नियंत्रण वाले इलाक़ों में जाकर वहां के हालात देखने की इजाज़त लेने के लिए कई बार नेताओं से संपर्क किया लेकिन हर बार उन्हें मना कर दिया गया.

रूस ने यूक्रेन पर जनसंहार करने का आरोप लगाया है.

हालांकि, स्वघोषित रूस समर्थित अधिकारियों के मुताबिक़, 2021 में विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाक़ों में आठ और 2020 में सात आम नागरिकों को मार दिया गया था.

इस पर मैंने कहा कि “हर मौत एक त्रासदी ज़रूर है, लेकिन इन मौतों को जनसंहार नहीं कहा जा सकता.”

मैंने उनसे पूछा कि अगर सच में नरसंहार हुआ है तो लुहांस्क और दोनेत्स्क के अलगाववादी हमें भीतर जाने देते, हमें क्यों नहीं जाने दिया गया.

इस पर लावरोफ़ बोले, “मुझे इस बारे में नहीं पता.”

(पॉल किर्बी की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ)

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स्टीव रोज़ेनबर्ग
बीबीसी रूसी भाषा के संपादक, मॉस्को