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लोग अब सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर उँगलियाँ उठाने लगे हैं : शाम 6.30 पर एकनाथ शिंदे का केस सुप्रीम कोर्ट में आया, शाम 7.30 बजे तय हो गया कि कल सुबह जज मामले की सुनवाई करेंगे!

मामला ज़किया जाफ़री का हो या किसी उच्च पद पर आसीन व्यक्ति को किसी जन नरशंहार के मामले में क्लीन चिट देने का अदालतों की कार्यवाही से आम आदमी अपने आप को आहत समझता है, अदालतों के बारे में प्रतक्रिया देने से लोग बचते रहते थे पर अब लोग खुल कर बोलने लगे हैं, कानून के दिग्गज जानकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर उँगलियाँ उठाने लगे हैं, बार-बार देखने को मिला है कि न्याय जिस तरह से काम करना चाहिए नहीं करता है बल्कि एक पक्ष के लिए काम करता नज़र आता है, कितने की मामले हैं जिनमे आम आदमी का भरोसा अदालतों ने तोडा है

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भारत में राजनीति एक बार फिर विधानसभा से निकलकर लग्ज़री रिज़ॉर्ट पहुंच गई है.

राजनीति का ये ताज़ा नाटक भारत के सबसे अमीर राज्य महाराष्ट्र में चल रहा है. प्रभावशाली मंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई में शिवसेना के लगभग चालीस विधायक राजधानी मुंबई से हज़ारों किलोमीटर दूर पूर्वोत्तर राज्य असम के गुवाहाटी में एक लग्ज़री होटल में ठहरे हुए हैं.

भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत कोई भी पार्टी जो सदन में आधे से अधिक विधायकों का समर्थन साबित कर सकती है, सरकार बना सकती है.

ऐसे में जब बहुमत का अंतर कम होता है, सरकारें, ख़ासकर गठबंधन सरकारें, हमेशा अपने पैरों के नीचे से राजनीतिक ज़मीन ख़िसकने के डर में रहती है. कई बार विपक्षी दल तो कई बार अपने ही असंतुष्ट विधायक पार्टी की सियासी ज़मीन खींच लेते हैं.

जब किसी राज्य में ऐसी परिस्थिति बनती है तो पार्टियां अपने विधायकों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें किसी रिज़ॉर्ट में ले जाकर बंद कर देती हैं. ऐसी ही परिस्थिति को आम भाषा में ‘रिज़ॉर्ट पॉलिटिक्स’ कहा जाता है. रिज़ॉर्ट में बंद किए गए विधायकों पर कड़ी नज़र रखी जाती है और उन्हें विपक्षी दल की पहुंच से दूर रखा जाता है. ये सब विधायकों को दल बदलने से रोकने के लिए किया जाता है.

महाराष्ट्र का राजनीतिक संकट
अपने विपक्षियों को विधायकों से दूर रखने के लिए नेता हरसंभव हथकंडा अपनाते हैं. शिंदे पहले अपने साथी बाग़ी विधायकों को लेकर गुजरात पहुंचे थे लेकिन रातोंरात इन सभी को गुवाहाटी पहुंचा दिया गया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि गुजरात महाराष्ट्र के बहुत क़रीब है और यहां बाग़ी विधायकों के फिर से उद्धव ठाकरे की तरफ़ लौटने का ख़तरा था.

बाग़ी विधायक शिवसेना के हैं, जो फिलहाल महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ मिलकर गठबंधन सरकार चला रही है. एकनाथ शिंदे और दूसरे बाग़ी विधायक गठबंधन से समर्थन वापस लेने की धमकी दे रहे हैं, जिसकी वजह से सरकार ख़तरे में आ गई है.

रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि शिंदे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ मिलकर नया गठबंधन बना सकते हैं. हालांकि बीजेपी का कहना है कि मौजूदा राजनीतिक संकट में उसकी कोई भूमिका नहीं है.

बुधवार को गुजरात के एक एयरपोर्ट पर महाराष्ट्र के विधायकों के असम की फ्लाइट पकड़ने के नाटकीय वीडियो वायरल हुए. विधायकों का पीछा कर रहे रिपोर्टरों ने उनसे सवाल करने की कोशिश की जबकि विधायक रास्ता बदलकर भागते हुए नज़र आए.

सोशल मीडिया पर एक यूज़र ने लिखा, “ऐसा लग रहा है जैसे किसी फ़िल्म का दृश्य हो.”

रिजॉर्ट पॉलिटिक्स
ये नाटकीय दृश्य कोई नई बात नहीं है. भारतीय राजनीति में 1980 के दशक से ही नेताओं को रिज़ॉर्ट में ठहराने का चलन शुरू हो गया था.

ऐसे कई होटल और रिज़ॉर्ट बेहद चर्चित हुए जहां ठहरकर नेताओं ने सरकारों को बचाने और गिराने के फ़ैसले लिए.

1984 में आंध्र प्रदेश प्रांत में रिज़ॉर्ट पॉलिटिक्स तब नज़र आई जब पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू कई विधायकों को लेकर पड़ोसी राज्य कर्नाटक के एक होटल पहुंच गए. वो चाहते थे कि आगामी अविश्वास प्रस्ताव के दौरान विधायक उनकी योजना के अनुसार वोट करें.

1980 के दशक में इस तरह की राजनीतिक कहानियां अख़बारों में छपती थीं, आज के दौर के नाटकीय दृश्य टीवी चैनल और सोशल मीडिया पर दिखाई देते हैं.

साल 2019 में जब कर्नाटक की सरकार को लगा कि विपक्षी पार्टी उसके विधायकों पर डोरे डाल रही है तो उन्हें एक लग्ज़री रिज़ॉर्ट में ले जाया गया. जिस समय राज्य राजनीतिक अस्थिरता में फंसा था, विधायक रिज़ॉर्ट में मौज कर रहे थे. इसके वीडियो सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुए.

कमज़ोर हो रही लोकतांत्रिक व्यवस्था
आलोचक कहते हैं कि ये राजनीतिक पार्टियों के भीतर कमज़ोर हो रही लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकेत है.

राजनीतिक विशेषज्ञ राहुल वर्मा कहते हैं, “विधायक कई बार दल बदलने के लिए मजबूर होते हैं क्योंकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने वो बहुत कमज़ोर होते हैं.”

“उनका टिकट या नामांकन बड़े नेताओं के प्रति वफ़ादारी पर निर्भर करता है, ऐसे में वो पार्टी भीतर किसी एक कैंप का हिस्सा बन जाते हैं और उसी से ही जुड़े रहते हैं.”

राजनीतिक लेखक सुधीर सूर्यवंशी इससे सहमत हैं.

सूर्यवंशी कहते हैं, “अब पार्टी के सिद्धांतों, मूल्यों और विचारधारा के प्रति वफ़ादारी की कोई भूमिका नहीं है. हर चुना हुआ प्रतिनिधि सत्ता का हिस्सा बनना चाहता है.”

भारत में दल बदल विरोधी क़ानून विधायकों या सांसदों को व्यक्तिगत स्तर पर पार्टी बदलने से रोकता है. हालांकि ये क़ानून तब लागू नहीं होता है जब किसी पार्टी के कुल विधायकों या सांसदों में सो दो-तिहाई से अधिक दल बदल लेते हैं. यही वजह है कि आजकल बड़ी संख्या में विधायक दल बदलते हैं.

वरिष्ठ नेताओं की निगरानी

भारत में दर्जनों मज़बूत क्षेत्रीय पार्टियां हैं और कई बार चुनावों में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता और गठबंधन सरकार बनती है. इससे ही दल-बदल की संभावना पैदा हो जाती है.

वर्मा कहते हैं, “अगर बाज़ार में कई छोटे खिलाड़ी हों तो हमेशा ही बड़े खिलाड़ी के लिए प्रतिद्ंवद्विता बढ़ाकर अपने आपको मज़बूत कर एकाधिकार स्थापित करने की संभावना खड़ी हो जाती है. इसी तरह पार्टियां भी काम करती हैं.”

और जब भी इस तरह का दल-बदल होता है, इसका ठिकाना बनते हैं लग्ज़री रिज़ॉर्ट और बड़े होटल. कई बार राज्य को राजनीतिक संकट में डालकर विधायक कैमरे पर क्रिकेट खेलते और रिज़ॉर्ट में आराम फरमाते दिखे हैं.

इस दौरान राजनेताओं के सभी डिजिटल डिवाइस और मोबाइल फ़ोन बंद करवा दिए जाते हैं और वो हर समय वरिष्ठ नेताओं की निगरानी में रहते हैं.

2019 में जब राजस्थान के विधायकों को लग्ज़री रिज़ॉर्ट में रखा गया था तब उनके मनोरंजन के लिए रात में फ़िल्मों का प्रदर्शन किया गया था और उन्हें मैजिक शो दिखाए गए थे. राजस्थान में तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच सत्ता तक पहुंचने की प्रतिद्वंदिता चल रही थी. नेताओं की इस छुट्टी ने इंटरनेट पर मीम और चुटकुलों की बाढ़ ला दी थी.

‘पकड़े जाने और बचकर भागने’ की कहानी
लेकिन हमेशा चीज़ें योजना के हिसाब से नहीं चलती हैं. ख़ासकर तब जब कुछ नेता अपने क़दम पर पुनर्विचार करने लगते हैं.

नेताओं के इस तरह के होटलों और रिज़ॉर्ट से भागने की कोशिश करने की रिपोर्टें भी आती रही हैं.

इस बार भी शिवसेना के कुछ नेताओं ने ‘ख़ुद के पकड़े जाने और बचकर भागने’ की कहानी को विस्तार से सुनाया है.

कैलास पाटिल का कहना है कि कुछ बाग़ी नेताओं ने उन्हें बताया है कि वो मुंबई में डिनर करने जा रहे हैं लेकिन उन्हें ज़बरदस्ती पड़ोसी राज्य गुजरात ले जाया गया. उन्होंने दावा किया कि वो किसी तरह कार से उतर गए और उन्हें कई मील पैदल चलना पड़ा और फिर उन्हें एक मोटरसाइकिल और फिर एक ट्रक में जगह मिली और वो किसी तरह मुंबई पहुंचे.

एक अन्य शिवसेना नेता ने दावा किया है कि जब उन्होंने गुजरात के होटल से भागने की कोशिश की तो कुछ लोगों ने उन्हें ज़बरदस्ती अस्पताल में भर्ती करवा दिया. वो अंततः भागने में कामयाब रहे और अब वो ठाकरे के प्रति वफ़ादारी ज़ाहिर कर रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के राजनीतिक नाटकों को भले ही प्राइम टाइम टीवी में ख़ूब जगह मिले, इनसे तेज़ी से ख़त्म हो रहे राजनीतिक मूल्यों के संकेत भी मिलते हैं.

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ज़ोया मतीन
बीबीसी संवाददाता

santosh gupta
@BhootSantosh
जो विदेश में लोकतंत्र का बाजा बजा रहे हैं, उनके लोकतंत्र की करनी हम मणिपुर, गोवा, मेघालय, मध्य प्रदेश, अरुणाचल और कर्नाटक में देख चुके हैं.!

जो खुद अरबों रुपए की हॉर्स ट्रेडिंग करके कई जगह सरकार चला रहे हैं, उनके मुंह से लोकतंत्र पर ज्ञान शोभा नहीं देता.!!


Archana Singh
@BPPDELNP
#UddhavThackrey जी विधानसभा भंग करिये चुनाव में उतरिये और राज्यो पर भी इसका असर पड़ेगा #BJP हारेगी !

गोहावटी छोड़ो – चौपाटी पहुँचो !
वरना चुनाव की तैयारी करो !

सुबह का भूला शाम को घर बापस आ जाये उसे भूला नही कहते !


Dilip Mandal
@Profdilipmandal
रविवार को कोर्ट का कामकाज बंद होता है। शाम 6.30 पर एकनाथ शिंदे का केस सुप्रीम कोर्ट में आया। शाम 7.30 बजे तय हो गया कि कल सुबह जज मामले की सुनवाई करेंगे। ये गजब की तेज़ी उस सुप्रीम कोर्ट में जहां 73,000 केस पेंडिंग हैं और कई बार केस करने वाला मर जाता है, फ़ैसला नहीं आता।

MSK Lucknow
@LucknowMsk
Jun 25
Level 1:
भगवान शंकर की तरह मोदी गुजरात दंगों के आरोपों का 18-19 साल विषपान करते रहे।
-सुप्रीम कोर्ट से नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट मिलने के बाद अमित शाह इंटरव्यू में।

भगवान शंकर का अपमान मानता हूं मैं नरेंद्र मोदी को उनसे जोड़ने पर।
और आप लोग ?

Archana Singh
@BPPDELNP
#ED और #CBI से हाथ जोड़कर निवेदन है कृपया अपनी भूमिका निष्पक्ष निभाये किसी के दबाब में काम न करे क्योंकि आपको तनख्वाह जनता के टैक्स के पैसों से मिलती है कोई सरकार अपनी जेब से नही देती है !
इस देश को बचाने में अहम भूमिका निभाये बचा ले देश को बर्बाद होने से !

डिस्क्लैमर : ट्वीट्स में व्यक्त विचार लोगों के अपने निजी विचार हैं, तीसरी जंग हिंदी का इन से कोई सरोकार