उत्तर प्रदेश राज्य

हम लोग तो पढ़े बाबा साहब को, चंद्रशेखर जी को, सुभाष चंद्र बोस को आने वाली पीढ़ी किसको पढ़ेगी?…बाबा बुलडोज़र को??

चार बीघा ज़मीन पर बने एक बड़े अहाते में टूटी हुई छतें सरिया पर टिकी हुई हैं.

बच्चों के कपड़े, जूते और कुर्सी-मेज़ें एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था धूल से सने पड़े हैं.

एसयूवी गाड़ियों के रेडिएटर, स्टीयरिंग व्हील और लोहे के बम्पर एक एक-दूसरे से अलग-थलग पड़े ज़ंग खा रहे हैं.

भीतर एक कोने में जहां कभी घर का किचन होता था, वो अब बिना छत के है और खुली पड़ी ख़ाली अलमारियों में कबूतरों को नया घर मिला चुका है.

चारों तरफ़ बने छोटे घरों से लोग झांक कर देखते है जब भी कोई मृत विकास दुबे के इस उजाड़ चुके घर के बारे में पूछता है या आता है, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं कि यहां से एक ईंट भी उठा लें.

खंडहर हो चुके इस आलीशान घर ने जुलाई, 2020 में बुलडोज़र का रौद्र रूप देखा था.

इसके पहले गैंग्स्टर विकास दुबे और साथियों ने यहीं- उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात ज़िले के बिकरु गांव- अपने घर दबिश मारने पहुंचे आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी और फ़रार हो गए.

एक हफ़्ते बाद मध्य प्रदेश में हुई गिरफ़्तारी के बाद विकास दुबे की तो एक कथित एनकाउंटर में मौत हो गई थी लेकिन उनके घर पर घंटों चली बुलडोज़र की कार्रवाई को देश भर के टीवी चैनलों पर जम कर दिखाया गया.

बुलडोज़र एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं. भारत के कई राज्यों में इनका इस्तेमाल एकाएक बढ़ा है और कई लोगों को लगता है इसके पीछे राजनीति भी है.

लेकिन अतिक्रमण विरोध के नाम पर कथित तौर पर बुलडोज़र के प्रकोप का आग़ाज़ उत्तर प्रदेश में हुआ था, विकास दुबे के घर से ही.

2017 में भारतीय जनता पार्टी ने विधान सभा चुनाव जीतने के बाद पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को कमान सौंपी.

चंद साल बाद गैंगस्टर विकास दुबे के कंपाउंड को बुलडोज़र से गिराकर उसे एक मैस्कॉट बनाने की कोशिश योगी सरकार को रास आ रही थी.

इधर योगी सरकार ने प्रदेश में हत्या और अपहरण के अभियुक्त कुछ नामचीन राजनेताओं जैसे मुख़्तार अंसारी और अतीक़ अहमद के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू कर दी.

अवैध अतिक्रमण हटाने को कार्रवाई की वजह बताया गया जिसके तहत इनकी कई कथित अवैध इमारतें ढहाई भी गईं.

यूपी में विधान सभा चुनाव दस्तक दे रहे थे और इस बार पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को अपना सीएम कैंडिडेट बना कर विपक्ष को ललकारा था.

लेकिन विपक्षी समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने उस समय की एक चुनावी रैली में बुलडोज़र के प्रयोग पर ज़ोर देते हुए कहा, “इस बार अंग्रेज़ी के एक प्रतिष्ठित अख़बार ने योगी जी का भी नाम बदल दिया. उनका नया नाम रखा है, बाबा बुलडोज़र. ये मैं नहीं, अख़बार कह रहा है”.

हालांकि अखिलेश यादव ने तंज़ कसा था लेकिन भाजपा को शायद इसमें एक बड़ा मौक़ा दिखा अपने वोटर-बेस बढ़ाने का.

हर चुनावी रैली में बुलडोज़र का उल्लेख होने लगा, “अपराधियों की नकेल कसने के लिए” और भाषणों में ये अनिवार्य होता चला गया.

एक वीडियो भी वायरल हुआ जिसमें योगी आदित्यनाथ एक हेलीकॉप्टर से किसी चुनावी रैली में उतरने के पहले अपने साथी को मुस्कुराते हुए दिखा रहे हैं, “वहां देखो, बुलडोज़र भी खड़े हैं. मेरी सभा में”

अवैध अतिक्रमण हटाने की शुरुआत चुनाव प्रचार में एक दूसरी ही शक्ल ले रही थी. लेकिन सवाल ये भी था कि क्या पहले कभी ऐसा कुछ हुआ था

उत्तर प्रदेश में जनमोर्चा अख़बार की सम्पादक और वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता याद करते हुए बताती हैं, “इंदिरा गांधी कार्यकाल में हम लोग जब पढ़ रहे थे तो इमरजेंसी के दौरान तुर्कमान गेट का वो कांड सुना था, पढ़ा था, जाना था. बुलडोज़र के उस इस्तेमाल को लेकर इतनी ज़्यादा आलोचना हुई थी और सरकार की इमरजेंसी की नीति को भी किसी ने स्वीकार नहीं किया था”.

इधर योगी सरकार बुलडोज़र के नाम पर वादे भी कर रही थी और कार्रवाई भी जारी थी.

अलग-अलग ज़िलों में अवैध अतिक्रमण हटाने के दौरान हाशिए पर रहने वाले भी बुलडोज़र की चपेट में आए.

आज़मगढ़ ज़िले में भी बुलडोज़र ने कई “अतिक्रमण” हटाए लेकिन ज़िले के गोधौरा गांव में हमारी मुलाक़ात राम नारायण से हुई जो क़रीब 20 साल से एक सरकारी पशुचर ज़मीन में कई अन्य दलित परिवारों के साथ रहते आए हैं.

इस बात को मानते हुए कि इस ज़मीन पर उनका मालिकाना हक़ नहीं है, राम नारायण ने कहा, “हमें भी तो गांव के पूर्व प्रधान वग़ैरह ने यहां बसाया था.”

उन्होंने आगे कहा, “दलितों का ही मकान गिराया जा रहा है बार बार, बाक़ी लोगों का नहीं. जहां तक क़ब्ज़े की बात है तो यहां यादव लोग भी बसे हैं, बाऊ साहब भी बसे हैं, राय साहब भी बसे हैं. सभी सरकारी ज़मीनों पर बसे हैं, किसी को नहीं बेदख़ल किया जा रहा है. फिर भी मुक़दमा हमारा चल रहा था तहसीलदार के यहां, जिस समय गिराया गया उस समय भी मुक़दमा चल रहा था. ग्यारह बजे हमको तारीख़ दे रहे हैं, बारह बजे हमारा मकान गिरा रहे हैं”.

बहरहाल, 2022 विधान सभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा की नीतियों पर फिर मुहर लगाई. नतीजे पूरी तरह से घोषित भी नहीं हुए थे कि लखनऊ में भाजपा मुख्यालय के सामने दर्जनों लोग बुलडोज़र की छत पर बैठ कर जश्न मना रहे थे.

खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कह चुके थे कि “हमारी सरकार सिर्फ़ विकास ही नहीं कराती है. हमारी सरकार ने बुलडोज़र का भी उपयोग करना शुरू किया है”.

ज़ाहिर है, जीत के बाद उनके चाहने वाले लोगों ने अपने सिर पर बुलडोज़र चिपका रखे थे, बैकग्राउंड में “योगी है बुलडोज़र के महाराज” वाला गाना चल रहा था और होली के पहले ही बुलडोज़र से गुलाल की बारिश कर रहे थे भाजपा समर्थक.

दूसरे राज्यों ने भी अपनाया ‘विनिंग फ़ॉर्मूला’
क़ानून व्यवस्था बनाए रखने का क्रेडिट बुलडोज़र को तो जो मिला सो मिला, दूसरे भाजपा शासित प्रदेशों में भी इस मॉडल को अपनाया जाने लगा. शायद उन्हें भी लगा कि उनके यहां ये एक ‘विनिंग फ़ॉर्मूला’ हो सकता है.

मध्य प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री को पता था कि अगला चुनाव जल्दी है और पिछला चुनाव वे हार चुके थे. कांग्रेस पार्टी के टूटने और उनसे हाथ मिलाने के पहले वे विपक्ष में बैठ चुके थे.

शिवराज सिंह ने एक सभा में कहा था, “शिवनी में बुलडोज़र चला है, शिवपुर में बुलडोज़र चला है, जावरा में हमने मकान खोद के मैदान बना दिया. गुंडागर्दी करने वालों, मध्यप्रदेश में तुम्हारा अस्तित्व मिटा दिया जाएगा”.

बल मिला ऐसी भावनाओं को भी जिसमें ‘बुलडोज़र बाबा, बुलडोज़र मामा और बुलडोज़र जस्टिस’ जैसे जुमले तेज़ी पकड़ने लगे.

यूपी में भाजपा की जीत के चंद महीनों बाद ही पैग़म्बर मोहम्मद पर उनकी एक नेता की विवादित टिप्पणी पर भारत के कई हिस्सों में मुस्लिम समुदाय के प्रदर्शन हुए, कुछ जगह पत्थरबाज़ी भी हुई.

जवाबी कार्रवाई में यूपी प्रशासन ने प्रयागराज, सहारनपुर और कानपुर जैसे ज़िलों में कुछ इमारतों पर बुलडोज़र ये कह कर चलवाया कि वे “अवैध थी और नगर निकाय के उन पर पहले से नोटिस लंबित थे”.

मिसाल के तौर पर कानपुर के पॉश इलाक़े स्वरूप नगर को ले लीजिए.

यहां एक कमर्शियल बिल्डिंग को गिराया गया और हमें वहां जो नोटिस चिपका मिला उसके मुताबिक़ इस इमारत के कई हिस्से अवैध थे. इस बीच कानपुर पुलिस का एक ऐसा भी बयान आया जिसमें कहा गया कि “ये जिनकी बिल्डिंग थी उनका कनेक्शन हिंसा और विरोध प्रदर्शन करने वालों से है”.

जिनकी बिल्डिंग है उन्होंने हमसे कहा कि वो “अभी कैमरे पर आकर बात करने की हालात में नहीं है”. उन्होंने कहा, “मेरी मेंटल स्थिति अभी आपसे बात करने के लिए मुनासिब नहीं है”.

इसके एक दिन पहले तक वो हमसे बात करने को तैयार भी थे और उन्होंने फ़ोन पर हमें ये बताया भी था कि, “मेरा विरोध और हिंसा करने वालों से कोई भी लेना-देना नहीं है और मेरी बिल्डिंग के लिए पहले मुझे कोई नोटिस नहीं दिया गया था”.

 

कार्रवाई पर उठते सवाल
ज़ाहिर है, विरोध के तुरंत बाद आनन-फ़ानन में की गई उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई पर सवाल भी उठे.

वाराणसी के गांधी अध्ययन पीठ की समाजशास्त्री मुनीज़ा खान इस बात को मानती हैं कि “जब यूपी इस की सरकार ने कार्यभार संभाला था तब प्रदेश में क्राइम बढ़ा हुआ था”.

उन्होंने कहा, “फ़िलहाल जो बुलडोज़र वाली पॉलिटिक्स है वो प्लांड-वे में लगता है कर रहे हैं और इरादा एक कम्युनिटी को डरा के रखना लगता है. मतलब आप कुछ बोलेंगे तो हम बुलडोज़र चला देंगे और ज़बरदस्ती आपके घर में जाँच कराएंगे. अगर कुछ भी मिलेगा तो हम कहेंगे ये आपत्तिजनक चीज़ें मिलीं हैं, आपकी राइटिंग्स मिली हैं, बुक्स मिली हैं”.

उधर प्रयागराज हिंसा मामले में मुख्य अभियुक्त बनाए गए जावेद मोहम्मद के घर को भी बुलडोज़र से ढहा दिया गया और सरकार ने कहा कि मामला अवैध अतिक्रमण का है.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों और वरिष्ठ वकीलों ने योगी सरकार के इस कदम पर सवाल उठाते हुए सर्वोच्च अदालत से मामले पर स्वत: संज्ञान लेने की अपील की.

इस बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट कर लिखा है कि ‘अपराधियों/माफ़ियाओं के विरुद्ध बुलडोज़र की कार्रवाई सतत जारी रहेगी.’

प्रयागराज में चला बुलडोज़र
प्रयागराज के करेली इलाक़े में जहां जावेद का घर गिराया गया, कोई भी पड़ोसी कैमरे में बात करने को तैयार नहीं. लेकिन सवाल यहां भी हैं.

जावेद की पत्नी का दावा है कि घर उनके नाम है और वे सारे हाउस टैक्स और वॉटर टैक्स समय पर जमा करती हैं. उनका कहना है कि नोटिस पति के नाम आया जो प्रॉपर्टी के मालिक ही नहीं थे.

जबकि प्रयागराज प्रशासन का कहना है कि ये अवैध निर्माण था और नोटिस का प्रयागराज में हुई हिंसा करने वालों से कोई सरोकार नहीं था.

बहराल, इस पूरे इलाक़े में ज़्यादातर लोग काफ़ी सहमे हुए हैं, ख़ामोश हैं और कैमरे पर आकर बात नहीं करना चाहते.

स्वर तेज़ हुए कि आख़िर क़ानूनी प्रक्रिया का कितना पालन हुआ और बुलडोज़र चलाने की कार्रवाई के ख़िलाफ़ कई रिटायर्ड जज सुप्रीम कोर्ट भी पहुँचे.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के नामचीन वकील रवि किरण जैन का मानना है कि, “सीधे बुलडोज़र चला देना तो भारतीय संविधान का ही उल्लंघन है”.

उन्होंने कहा, “उनको नोटिस देना चाहिए, विद ए रीज़नेबल ऑपरच्युनिटी और सुनवाई का मौक़ा भी देना चाहिए. उसके बाद अपील भी होती है जिसका मौक़ा देना चाहिए. अगर ये नहीं किया जाता तो ये ग़ैर क़ानूनी तरीक़ा समझा जाता है. अगर किसी की लायबिलिटी क्रिमिनल केस में है, उसका तो घर गिरा ही नहीं सकते. डेमोलिशन एक राइट ऑफ़ लिविंग भी देता है”.

जवाब में योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि अवैध निर्माण को गिराने की कार्रवाई बिना किसी भेदभाव के नगर निकाय के नियमों के अनुसार की जा रही है.

उत्तर प्रदेश में सूर्य प्रताप सिंह जैसे कुछ लोग इस बात से इत्तेफ़ाक भी रखते मिले. उन्होंने बताया, “योगी जी का बुलडोज़र कामयाब है. वो उन्हीं के लिए चलाई जा रही है जो प्रदेश में छेड़खानी कर रहे हैं, या कोई दंगा-फ़साद कर रहे हैं, उन्हीं लोगों पर बुलडोज़र चल रहा है. किसी ग़रीब या ग़लत पर नहीं चल रहा है.”

लेकिन प्रदेश के राय बरेली ज़िले में रमेश कुमार जैसे ट्रक चालक भी मिले जिन्हें लगता है, ” ये सब बदले की भावना है और कुछ नहीं. जो विरोध कर रहा है उसका घर ढहा दो, अपने आप शांत हो जाएगा. करोगे क्या? आप लोग हैं जो बहुत कुछ सच्चाई बता रहे हैं, बाक़ी तो चैनल भी बिक गए हैं न? हम लोग तो पढ़े बाबा साहब को, चंद्रशेखर जी को, सुभाष चंद्र बोस को. आने वाली पीढ़ी किसको पढ़ेगी? किसको याद करेगी, किसके दिशानुसार चलेगी. इन लोगों के?”

कई जानकारों को लगता है कि कि अतिक्रमण हटाने की पहल के बाद बुलडोज़र को अल्पसंख्यक वर्ग की तरफ़ मोड़ दिया गया.

मिसाल के तौर पर दिल्ली के जहांगीरपुरी में जहाँ बुलडोजर चला, वो इलाका बीजेपी नेता के शब्दों में कथित तौर पर दंगाइयों और बांग्लादेशी घुसपैठियों का था.

वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता के मुताबिक़, “जब 2022 चुनाव के नतीजे आए तो लोग बुलडोज़र पर चढ़ कर नाच रहे थे, औरतें पूजा कर रही थीं. हम किस संस्कृति, किस देश और किस संविधान की बात कर रहे हैं? पॉलिटिकल माइलेज लेने की बात अलग है क्योंकि जब पॉलिटिकल लीडर बोलता है तो कहता है हमने रिटर्न गिफ़्ट दे दिया, लेकिन जब आप अदालत में जाते हैं तो कहते हैं ये अतिक्रमण था”.

ज़ाहिर है, जिस प्रदेश में बुलडोज़र से क़ानून का पालन करवाने की कथित शुरुआत हुई वहां की सरकार इसे गुड गवर्नेंस का मॉडल बताती है.

भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रवक्ता संजय चौधरी ने गीता की याद दिलाते हुए कहा, “परित्राणाय च साधू नाम, विनाशाय च दुश्कृताम, यानी जो ठीक कर रहा है सरकार को उसके पक्ष में खड़ा होना पड़ेगा. और जो लोगों का शोषण कर रहे हैं उनके ख़िलाफ़ दण्डात्मक कार्रवाई करनी पड़ेगी. ये रूल ऑफ़ लॉ का एक बेसिक सिद्धांत है”.

मैंने सवाल किया कि, “बुलडोज़र ही सही, लेकिन सरकार का काम जस्टिस देना नहीं, वो तो न्यायपालिका का काम है. तो क्या जल्दी इंसाफ़ देने के चक्कर में क़ानूनी प्रक्रिया को कमज़ोर तो नहीं किया जा रहा?”

संजय चौधरी का जवाब था, “लोकतंत्र में जनता की अदालत के निर्णय को तो सभी को स्वीकार करना पड़ेगा. ये मानसिकता, जिसमें अपराधी मान बैठे हैं कि किसी भी नियम का, क़ानून का पालन न करने का उन्हें विशेषाधिकार है क्योंकि वे अपराधी हैं, तेज़ी के साथ उस पर रोक हो या अटैक हो तो वो मॉडल नहीं बन पाते. हमारी सरकार ने कितना बड़ा काम किया कि सभी धर्मस्थलों से लाउडस्पीकर उतर जाएं और उसे सामान्य रूप में सभी ने स्वीकार भी किया”.

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नितिन श्रीवास्तव
बीबीसी संवाददाता