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एक डॉलर की तुलना में रुपया 80.0125 पर पहुँच गया : रुपए में गिरावट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर : रिपोर्ट

भारतीय मुद्रा रुपए में जारी गिरावट थम नहीं रही है और मंगलवार को एक डॉलर की तुलना में रुपया 80.0125 पर पहुँच गया.

इस साल क़रीब 30 अरब डॉलर विदेशी निवेश भारत से बाहर जा चुका है और रुपए पर इसका सीधा असर पड़ा है. इससे चालू खाता घाटा और बढ़ने की आशंका है.

ऐसा तब हो रहा है, जब वैश्विक स्तर पर तेल की क़ीमतें लगातार बढ़ रही हैं. भारत सरकार कमज़ोर होते रुपए को रोकने के लिए सोने के आयात पर टैक्स बढ़ा रही है. लेकिन यह केवल भारत की मुद्रा की बात नहीं है. बाक़ी की उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं की हालत भी ऐसी ही है. इस साल भारत की मुद्रा में सात फ़ीसदी की गिरावट आई है.

थाईलैंड ने 1997 के जुलाई महीने में अपनी मुद्रा का एक दशक से ज़्यादा समय के बाद अवमूल्यन किया था. थाईलैंड ने ऐसा निर्यात बढ़ाने के उद्देश्य से किया था. थाईलैंड ने पहले अपनी मुद्रा बाट को दुरुस्त रखने के लिए अरबों डॉलर खर्च किया, मगर बाद में सरकार को हथियार डालने पड़े और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के सामने झुकना पड़ा. तब थाईलैंड की मुद्रा में 15 फ़ीसदी का अवमूल्यन किया गया था. यानी डॉलर की तुलना में 15 फ़ीसदी जानबूझकर कमज़ोर किया गया था.

एशियाई मौद्रिक नीति में इसे बड़े बदलाव के तौर पर देखा गया था. इससे पहले थाईलैंड ने 1984 में अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया था. तब जोक चलता था कि मज़बूत डॉलर से बैंकॉक में मसाज कराना और सस्ता होगा.

कमज़ोर मुद्रा किसी के लिए ख़ुशी लेकर आती है तो कइयों को नुक़सान करती है. लेकिन कमज़ोर मुद्रा को कमज़ोर अर्थशास्त्र की निशानी के तौर पर देखा जाता है. लेकिन इसमें कोई विवाद नहीं है कि अस्थिर मुद्रा किसी के भी हित में नहीं होती. इससे चीज़ें महंगी होती हैं और अस्थिरता का माहौल रहता है.

1947 में जब देश आज़ाद हुआ तो रुपए और डॉलर की क़ीमत में कोई फ़र्क़ नहीं था. आज़ादी के बाद से अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपए में गिरावट आती रही और आज की तारीख़ में एक डॉलर की क़ीमत क़रीब 80 रुपए से ज़्यादा हो गई है. अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की क़ीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार है.

भारत अपनी ज़रूरत का 80 फ़ीसदी तेल आयात करता है. आरबीआई के अनुसार 2017-18 में भारत ने 87.7 अरब डॉलर तेल आयात पर खर्च किया. ज़ाहिर है तेल की क़ीमत बढ़ती है तो भारत के तेल का आयात बिल भी बढ़ता है और इसका सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है.

मतलब डॉलर की मांग बढ़ती है तो घरेलू मुद्रा का कमज़ोर होना लाजिमी है. कमज़ोर रुपया और अंतरराष्ट्रीय मार्केट में तेल की बढ़ती क़ीमत का असर ये होता है कि देश के भीतर पेट्रोल और डीज़ल महंगे हो जाते हैं.

1966 में इंदिरा गांधी की सरकार ने डॉलर की तुलना में रुपए में 4.76 से 7.50 तक का अवमूल्यन किया था. कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने कई एजेंसियों के दबाव में ऐसा किया था ताकि रुपए और डॉलर का रेट स्थिर रहे. सूखे और पाकिस्तान-चीन से युद्ध के बाद उपजे संकट के कारण यह इंदिरा गांधी ने यह फ़ैसला किया था.

1991 में नरसिम्हा राव की सरकार ने डॉलर की तुलना में रुपए का 18.5 फ़ीसदी से 25.95 फ़ीसदी तक अवमूल्यन किया था. ऐसा विदेशी मुद्रा के संकट से उबरने के लिए किया गया था. इसके बाद रुपए में गिरावट किसी भी सरकार में नहीं थमी. वो चाहे अटल बिहारी वाजपेयी पीएम रहे हों या अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह. और अब मज़बूत मोदी सरकार में भी यह सिलसिला थम नहीं रहा.