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नेपाल की संसद के दोनों सदनों से पास नागरिकता संशोधन विधेयक राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने वापस लौटाया

– नेपाल में नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर गरमाई राजनीति

– संसद के दोनों सदनों से पास, लेकिन राष्ट्रपति बिद्या देवी ने वापस लौटाया

– केपी शर्मा ओली की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी यूएमएल कर रही है विरोध

काठमांडू: नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने संसद में पारित होने के एक महीने बाद देश का पहला नागरिकता संशोधन विधेयक पुनर्विचार के लिए प्रतिनिधि सभा को रविवार को लौटा दिया। राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता सागर आचार्य ने कहा कि चूंकि सदन में विधेयक की समीक्षा करना आवश्यक समझा गया है, इसलिए उसे वापस भेज दिया गया है। प्रतिनिधि सभा और नेशनल असेंबली के पारित किये जाने के बाद विधेयक को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति को भेजा गया था। भारत में भी दिसंबर 2019 में पास किए गए नागरिकता संशोधन कानून को लेकर व्यापक स्तर पर विरोध देखने को मिला था।

ओली की पार्टी कर रही है विरोध
इस विधेयक के जरिये नेपाल नागरिकता अधिनियम 2063बीएस को संशोधित किया गया था। इसे लेकर विवाद शुरू हो गया था और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) ने इसके कुछ प्रावधानों को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई थी। विधेयक के विवादित प्रावधानों में से एक प्रावधान यह भी है कि नेपाली नागरिक से शादी करने वाली विदेशी महिलाओं को तत्काल नागरिकता प्रमाण-पत्र जारी किया जाएगा।

14 जुलाई को नेपाली संसद ने पारित किया था विधेयक
नेपाल की संसद ने 14 जुलाई को विधेयक पारित किया था। यह विधेयक दो साल से अधिक समय से विचाराधीन था, क्योंकि राजनीतिक दल इस पर आम सहमति बना पाने में विफल रहे थे। केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) इस विधेयक का नेपाली संप्रभुता के नाम पर विरोध कर रही है। उसका दावा है कि इस विधेयक के पारित होने से बाहरी लोगों को नेपाल की नागरिकता मिल सकती है, जिससे मूल निवासियों पर खतरा मंडराने लगेगा। हालांकि, सत्ताधारी नेपाली कांग्रेस ने इस तरह के आरोपों को सिरे से खारिज किया है।

ओली का पक्ष ले रहीं नेपाली राष्ट्रपति?
बिद्या देवी भंडारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) की उपाध्यक्ष भी रह चुकी हैं। इस पार्टी के चेयरमैन पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली हैं। ऐसे में आरोप लग रहे हैं कि वह जानबूझकर ओली के पार्टी का पक्ष ले रही हैं। हालांकि, राष्ट्रपति का पद दलगत राजनीति से ऊपर माना जाता है। पहले भी 2021 में हुए राजनीतिक संकट के दौरान राष्ट्रपति बिद्या देवी ने ओली का ही पक्ष लिया था।