विशेष

मौलाना से कहो कि वह अपने बेटे की फ़िक्र न करें, जो अल्लाह की मर्ज़ी से होना तय है, वह होकर रहेगा!

Naem Parvez Khan
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एक बार एक कवि हलवाई की दुकान पहुँचे, जलेबी ली और वहीं खाने बैठ गये।
इतने में एक कौआ कहीं से आया और दही की परात में चोंच मारकर उड़ चला….
हलवाई को बड़ा गुस्सा आया उसने पत्थर उठाया और कौए को दे मारा।
कौए की किस्मत ख़राब, पत्थर सीधे उसे लगा और वो मर गया….
ये घटना देख कर कवि हृदय जगा। वो जलेबी खाने के बाद पानी पीने पहुँचे तो ✍उन्होंने एक कोयले के टुकड़े से वहाँ एक पंक्ति लिख दी।
*”काग दही पर जान गँवायो”*
✍🏽 तभी वहाँ एक लेखपाल महोदय, जो कागजों में हेराफेरी की वजह से निलम्बित हो गये थे, पानी पीने आए।
कवि की लिखी पंक्तियों पर जब उनकी नजर पड़ी तो अनायास ही उनके मुँह से निकल पड़ा…
कितनी सही बात लिखी हैं ! क्योंकि उन्होंने उसे कुछ इस तरह पढ़ा :-
*”कागद ही पर जान गँवायो”*
🏃तभी एक मजनूँ टाइप लड़का, पिटा-पिटाया सा वहाँ पानी पीने आया।
उसे भी लगा कितनी सच्ची बात लिखी हैं। काश उसे ये पहले पता होती, क्योंकि उसने उसे कुछ यूँ पढ़ा था :-
*”का गदही पर जान गँवायो”*
इसीलिए संत तुलसीदास जी ने बहुत पहले ही लिख दिया था :-
*”जाकी रही भावना जैसी… प्रभु मूरत देखी तिन तैसी”*


Shoaib Gazi
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“मौलाना से कहो कि वह अपने बेटे की फिक्र न करे। जो अल्लाह की मर्जी से होना तय है, वह होकर रहेगा। लेकिन वह अंग्रेज़ो के सामने नहीं टूटेगा और ना ही माफी मांगेगा ”
ये अल्फाज़ उस बहादुर औरत के हैं जिसने अकेले अंग्रेजों का सामना किया, उसका बेटा गंभीर रूप से बीमार था और उसके पति मौलाना मोहम्मद इब्राहिम खान अलवरी को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के जुर्म में अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया था। उन्होंने गांधी जी के साथ नमक सत्याग्रह में भाग लिया था और घायल भी हुए थे।
अम्मा बी ने ब्रिटिश शासन का विरोध करते हुए भारतीय मुस्लिम महिलाओं की बहादुरी की मिसाल पेश की। अम्मा बी का जन्म 1918 में हुआ था, वह ऐतिहासिक फिरोजपुर (मेवात, हरियाणा) की रहने वाली थीं।
उनके पति की गिरफ्तारी से भी उनका हौसला नहीं टूटा। उन्होने अपने अनुयायियों और साथियों के साथ काम किया और आज़ादी की लड़ाई को आगे बढ़ाया।
अन्य दायित्वों के बावजूद, अम्मा बी ने महिलाओं को शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मौलाना इब्राहिम की मृत्यु के बाद भी, उसने अपने प्रयास जारी रखे
18 दिसंबर 1995 को फज्र समय में उनका निधन हो गया। हम उनकी कुर्बानियों को कभी नहीं भूल सकते।
डॉ मुफ्ती मोहम्मद मुश्ताक तिजारवी ने “आसिया खातून मेवाती: जंग-ए-आजादी की गुमनाम मुजाहिदा” नामक एक किताब लिखी है जिसे आप अम्मा बी के बारे में अधिक जानने के लिए पढ़ सकते हैं।

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