इतिहास

🌺🌺औरंगज़ेब और हिन्दू मन्दिर🌺🌺🌺🌺आलमगीर हिन्दूकुश था, ज़ालिम था, सितमगर था”🌺🌺

My country mera desh
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🌺औरंगज़ेब और हिन्दू मन्दिर🌺
एक शायर ने बडे दर्द के साथ लिखा है:
तुम्हें ले दे के, सारी दास्ताँ में, याद है इतना;
कि आलमगीर हिन्दूकुश था, ज़ालिम था, सितमगर था”।

बचपन में मैनें भी इसी तरह का इतिहास पढा था और मेरे दिल में भी इसी तरह की बदगुमानी थी। लेकिन एक घटना ऐसी पेश आई जिसने मेरी राय बदल दी। मैं सन् 1948-53 में इलाहाबाद म्युनिसिपैलिटी का चैयरमैन था। त्रिवेणी संगम के निकट सोमेशवर महादेव का मन्दिर है। उसके पुजारी की मृत्यु के बाद मन्दिर और मन्दिर की जयदाद के दो दावेदार खडे हो गये। उनमें से एक फरीक ने कुछ दस्तावेज दाखिल किए थे। दूसरे फरीक के पास कोई दस्तावेज़ नहीं थे। जब मैंने दस्तावेज़ पर नज़र डाली तो देखा कि वह औरंगज़ेब का फरमान था। जिसमें मन्दिर के पुजारी को ठाकुर जी को भोग और पूजा के लिए जागीर में दो गाँव अता किए गये थे। मुझे शुबहा हुआ कि ये दस्तावेज़ नकली है। औरंगज़ेब तो बुतशिकन, मूर्तिभंजक था। वह बुत परस्ती के साथ अपने आप को कैसे वाबस्ता कर सकता था। मैं अपना शक़ रफा करने के लिए सीधा अपने चैम्बर से उठकर सर तेज बहादुर सप्रू के यहाँ गया। सप्रू साहब फारसी के आलिम थे। उनहोंने फरमान को पढकर कहा कि ये फरमान असली है।

मैंने कहा- “डाक्टर साहब ! आलमगीर तो मन्दिर तोडता था। बुतशिकन था, वह ठाकुर जी को भोग और पूजा के लिए कैसे जायदाद दे सकता था?”
डा. सप्रू साहब ने अपने मुंशी को आवाज़ देकर कहा- “मुंशी जी ज़रा बनारस के जंगमबाडी शिवमन्दिर की अपील की मिसिल तो लाओ। “मुंशी जी मिसिल लेकर आए तो डाक्टर सप्रू ने दिखाया कि औरंगज़ेब के चार फरमान और थे जिनमें जंगमों को माफी की जमीन अता की गई थी। डा. सप्रू की सलाह से मैंने भारत के प्रमुख मन्दिरों की सूची प्राप्त की और उन सबके नाम पत्र लिखा कि अगर उनके मन्दिरों को औरंगज़ेब या मुगल बादशाह ने कोई जागीर दी हो, तो उनकी फोटो कापियाँ मेहरबानी करके भेजिये। दो तीन महीने की प्रतीक्षा के बाद हमें महाकाल मन्दिर, (उज्जैन), बालाजी मन्दिर (चित्रकूट), उमानन्द मन्दिर(गौहाटी), जैन मन्दिर (गिरनार), दिलवाडा मन्दिर (आबू), गुरूद्वारा रामराय (देहरादून) वगैरह से सूचना मिली कि उनको औरंगज़ेब ने जागीरें अता की थीं। एक नया औरंगज़ेब हमारी आँखों की सामने उभर कर आया।

हमारी तरह ही प्रसिद्ध पुरातत्वेत्ता डा. परमेशवरीलाल गुप्त ने भी अपने शोध प्रबन्धों से हमारे इस कथन की पुष्टि की है। उनके अनुसार:-👇👇
हिन्दूद्रोही और मन्दिर भंजक के रूप में जिस किसी इतिहासकार ने औरंगज़ेब का यह चित्र उपस्थित किया, उसने अंगरेजों को अपनी फूट डालो और राज करो वाली नीति के प्रतिपादन के लिए एक जबरदस्त हथियार दे दिया। उसका भारतीय जनता पर इतना गहरा प्रभाव पडा कि उदार राष्ट्रीय विचारधारा के इतिहासकार और विशिष्ट चिंतक भी उससे अपने को मुक्त नहीं कर सके हैं। उन्होंने भी स्वयं तटस्थ भाव से तथ्यों का विश्लेषण न कर यह मान लिया है कि औरंगज़ेब हिन्दूओं के प्रति असहिष्णु था।

“इसमें सन्देह नहीं कि औरंगज़ेब एक धर्म्निष्ठ् मुसलमान था। उसके द्वारा जज़िया कर का ज़ारी किया जाना भी उसकी इस्लामी सिद्धांतों के प्रति आस्था का प्रतीक है। अत: हमारे इतिहासकारों की औरंगज़ेब के बारे में क्या विचारधारा रही है, इसको जानने और मानने की अपेक्षा अधिक उचित यही होगा कि हम औरंगज़ेब के समसामयिक बुद्धिवादियों के कथन को महत्व दें और जानें कि औरंगज़ेब के सम्बन्ध में उनकी क्या धारणा थी।“

1908 हिजरी का औरंगज़ेब के द्वारा जारी फरमान है, जिसमें कहा गया है कि बनारस में गंगा किनारे बेंनीमाधो घाट पर दो टुकडे जमीन बिना निर्माण के खाली पडी है और बैतु-उल-माल है। इनमें से एक बडी मसजिद के पीछे रामजीवन गुंसाईं के मकान के सामने है और दूसरा उससे कुछ उँचाई पर है। इस भूमि के इन टुकडों को हम रामजीवन गुंसाईं और उसके लडकों को बतौर इनाम देते हैं ताकि वह उस पर धार्मिक ब्राह्म्णों और साधुओं के रहने के लिए सत्र बनवाएँ।
काशी मे शैव सम्प्रदाय के लोगों का एक सुविख्यात मठ जंगमबाडी है। इस मठ के महंत के पास औरंगज़ेब के द्वारा दिए गये कतिपय फरमान हैं। इनमें से पाँच रमज़ान 1071 हिजरी को जारी किया गया औरंगज़ेब का फरमान है जिसके द्वारा उसने जंगमों को परगना में 178 बीघा जमीन अपने सिर से निसार स्वरूप प्रदान किया है और कहा कि यह भूमि माफी समझी जाये ताकि वह उसका उपभोग कर सकें और राज्य के चिरस्थाई बने रहने की कमना करते रहें।
ये राजपत्र इस बात की स्पष्ट अभिव्यक्ती करते हैं कि औरंगज़ेब का हिन्दू धर्म के प्रति कोई विद्वेष्णा न थी। यह बात मूर्तियों और मन्दिरों के बारे में भी कही जा सकती है।

औरंगज़ेब की भावना को स्पष्ट करने की दृष्टि से अधिक महत्व का फरमान वह है जिसे उसने जालना के एक ब्राह्म्ण की फरीयाद पर जारी किया था। उस ब्राह्म्ण ने अपने घर में गणेश की एक मूर्ति प्रतिष्ठीत की थी। उसे वहाँ के एक मुसलमान अधिकारी ने हटवा दिया था। इस कार्य के विरुद्ध उसने औरंगज़ेब से फरियाद की। औरंगज़ेब ने तत्काल मूर्ति लौटाने का आदेश दिया और इस प्रकार के हस्तक्षेप का निषेध किया। इन सबसे अधिक महत्व का वह फरमान है जो ”बनारस फरमान” के नाम से इतिहासकारों के बीच प्रसिद्ध है और जिसे लेकर यदुनाथ सरकार सदृश गम्भीर इतिहासकार ने अपनी “हिस्ट्री आफ औरंगज़ेब” में यह मत प्रतिपादित किया है कि औरंगज़ेब ने हिन्दू धर्म पर अपना आक्रमण बडे छद्म रूप में प्रारम्भ किया। इस फरमान का सहारा लेकर यदुनाथ सरकार ने औरंगज़ेब को धर्मान्ध सिद्ध करने की कोशिश में इस फरमान के केवल कुछ शब्द ही उद्धृत किए हैं। यदि इन इतिहासकारों ने इमानदारी बरती होती और समूचे फरमान को सामने रखकर सोचा होता तो तथ्य निस्सन्देह भिन्न रूप में सामने आता और औरंगज़ेब का वह रूप सामने न होता जो इन इतिहासकारों ने प्रस्तुत किया है। इस फरमान के सम्बन्ध में 1905 ई. से पूर्व किसी भी इतिहासकार को कोई जानकारी न थी। उस समय तक वह काशी के मंगलागौरी मुहल्ले के एक ब्राह्म्ण परिवार में दबा पडा था। उस वर्ष किसी पारिवारिक विवाद के प्रसंग में गोपी उपाद्ध्याय के दैहित्र मंगल पान्डेय ने इस फरमान को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में उपस्थित किया।


इस फरमान के अनुसार “हमारी व्यक्तिगत एवं स्वाभाविक सद्भावनाएँ समग्र रूप से ऐसी दिशा में झुकी हुई हैं कि जिससे जनता की भलाई और देश में रहने वालों का सुधार हो, तथा हमारे धर्म में ऐसा निश्चित है, कि मन्दिर कतई न तोडे जाएँ और नए मन्दिर न बनवाए जाएँ। हमारे न्यायपूर्ण राज्य में यह सूचना मिली है कि कुछ लोग बनारस के रहने वाले हिन्दुओं पर और उनके पास रहने वालों पर, वहाँ के रहने वाले ब्राह्म्णों पर, जो कि मन्दिरों का इंतज़ाम करते रहे हैं, हस्तक्षेप कर अत्याचार कर रहे हैं, और चाहते हैं कि वहाँ का प्रबन्ध जो चिर्काल से उनके हाथ में है, छिन लें। इस कारण वे लोग बहुत परेशान और बेहाल हैं। अत: यह सन्देश भेजा जाता है कि इस फरमान के पहुँचने के साथ ही दृढता के साथ यह घोषित कर दिया जाए कि कोई भी व्यक्ति किसी भी कारण इन ब्राहम्णों और इस स्थान के रहने वाले अन्य हिन्दुओं को बिलकुल न छेडें और न उन्हें परेशान करें। इस आदेश को आवश्यक और गम्भीर समझा जाए।“

इस फरमान में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे यदुनाथ सरकार की शब्दावली में “छद्म रूप से हिन्दू धर्म पर आक्रमण” की संज्ञा दी जा सके। वरन इस फरमान से इसके विपरीत, यह ज्ञात होता है कि हिन्दुओं और ब्राहम्णों के धार्मिक मामलों, मन्दिरों के प्रबन्ध में कुछ लोग अनुचित हस्तक्षेप कर रहे थे और उन्हें तंग कर रहे थे। हो सकता है, कि मन्दिरों को तोडे जाने की भी बात की जा रही हो। इन सबकी शिकायत जब औरंगज़ेब के पास पहुँची तो उसने यह फरमान जारी कर उसकी आवश्यकता और गम्भीरता पर जोर देते हुए दुष्टता करने वालों को कडी चेतावनी दी। स्पष्ट रूप से कहा गया कि सम्राट के धर्म अर्थात इस्लाम में यह आदेश है कि मन्दिर कतई न तोडे जाएं और नये मन्दिर न बनवाए जाएं।

इन सब तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में स्वभाविक रूप से यह प्रशन उभरता है कि यदि औरंग्ज़ेब का वस्तुत: इस कथन में विशवास था कि मन्दिर न तोडे जाएं तो फिर क्यों उसी के शासनकाल में और उसी के आदेश से ज्ञानवापीवाला विश्वनाथ मन्दिर तोडा गया? इस सम्बन्ध में हम पाठकों का ध्यान पट्टाभि सीतारामैया की पुस्तक “फैदर्स एंड स्टोंस” की और आकृष्ट करना चाहेंगे। उन्होंने इस ग्र्ंथ में लिखा है कि लखनऊ के किसी प्रतिष्ठित मुसलमान सज्जन (नाम/नहीं दिया है) के पास कोई हस्तलिखित ग्रंथ था जिसमें इस घटना पर प्रकाश डाला गया है। सीतारामैया का कहना है कि इस ग्रंथ का समुचित परीक्षण किए जा सकने के पूर्व उक्त सज्जन का निधन हो गया और वह ग्रंथ प्रकाश में न आ सका। उस ग्रंथ में इस घटना के सम्बन्ध में जो कुछ कहा गया था उसका सीतारामैया ने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है। उनके कथनानुसार घटना इस प्रकार

तत्कालीन शाही परम्परा के अनुसार, मुगल सम्राट किसी यात्रा पर निकलते थे तो उनके साथ राज सामंतों की काफी बडी संख्या चलती थी और उनके साथ उन सबका अंत:पुर भी चलता था। कहना ना होगा, मुगल दरबार में हिन्दू सामंतों की संख्या काफी बडी थी। उक्त ग्रंथ के अनुसार, एक बार औरंगज़ेब बनारस के निकट के प्रदेश से गुजर रहे थे। ऐसे अवसर पर भला कौन हिन्दू होता जो दिल्ली जैसे दूर प्रदेश से आकर गंगास्नान और विश्वनाथ दर्शन किए बिना चला जाता, विशेष रूप से स्त्रियाँ। अत: प्राय: सभी हिन्दू दरबारी अपने परीवार के साथ गंगा स्नान करने और विश्वनाथ दर्शन के लिए काशी आए। विश्वनाथ दर्शन करके जब लोग बाहर आए तो ज्ञात हुआ कि उनके दल की एक रानी गायब है। इस रानी के बारे में कहा जाता है कि वह कच्छ् की रानी थी। लोगों ने उन्हें मन्दिर के भीतर जाते देखा था पर मन्दिर से बाहर आते वह किसी को नहीं दिखीं।

लोग इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि वह मन्दिर के भीतर ही कहीं रह गई हैं। काफी छानबीन की गई पर उनका पता न चला। जब अधिक कडाई और सतर्क्ता से खोज की गई तो मन्दिर के नीचे एक दुमंज़िले तहखाने का पता चला जिसका द्वार बाहर से बन्द था। उस द्वार को तोडकर जब लोग अन्दर घुसे तो उन्हें वस्त्राभूषण विहीन, भय से त्रस्त रानी दिखाई पडीं। जब औरंगज़ेब को पंडों की यह काली करतूत ज्ञात हुई तो वह बहुत कुद्ध हुआ और बोला- जहाँ मन्दिर के गर्भ-ग्रह के नीचे इस प्रकार की डकैती और बलात्कार हों तो वह निस्सन्देह ईश्वर का घर नहीं हो सकता। और उसने उसे तुरंत गिराने का आदेश दे दिया। आदेश का तत्काल पालन हुआ। जब उक्त रानी को सम्राट के इस आदेश और उसके परिणाम की खबर मिली तो वह अत्यंत दुखी हुई और उसने सम्राट को कहला भेजा कि इसमें मन्दिर का क्या दोष, दुष्ट तो पान्डे हैं। उसने यह भी हार्दिक इच्छा प्रकट की कि उसका फिर से निर्माण करा दिया जाए। औरंगज़ेब के अपने धार्मिक विश्वास के कारण, जिसका उल्लेख उसने बडी स्पष्टता से अपने “बनारस फरमान” में किया है, उसके लिए नया मन्दिर बनवाना असम्भव था। अत: उसने मन्दिर के स्थान पर मस्जिद खडी कर रानी की इच्छा पूरी कर दी।

यह घटना कितनी एतिहासिक है, यह कहने के लिए सम्प्रित कोई साधन नहीं है किंतु इस प्रकार की घटनाएँ प्राय: मन्दिरों में घटती रही है, यह सर्वविदित है। यदि ऐसी कोई घटना औरंगज़ेब के समय में घटी हो तो कोई आश्चर्य नहीं। यदि एसी घटना वस्तुत: घटी थी तो औरंगज़ेब स्दृश मुसलमान नरेश ही नहीं, कोई भी न्यायप्रिय शासक यही करता। यदि औरंगज़ेब के परिप्रेक्ष्य में विश्वनाथ मन्दिर गिराया गया था तो उसके लिए औरंगज़ेब पर किसी प्रकार का कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता।

🚩बालाजी मन्दिर चित्रकूट: औरंगज़ेब का फरमान🚩
इस फरमान के ज़रिए हुक्म दिया जाता है कि महंत बालकदास पिसरगोपी को बराए मसारिफ पूजा व भोग बालाजी तीन सौ तीस बीघा जमीन इनायत की जाती है। करोडियों और जागीरदारों को मुतनब्बे किया जाता है, चाहें मौजूदा हों और चाहें मुस्तक़बिल में होने वाले हों, मेरे हुक़्म की खिलाफवर्जी न करें और ना ही मेरे हुक़्मनामों में किसी किस्म का इन्हिराफ करें। यह तीन सौ तीस बीघा जमीन हर क़िस्म के लगान से आजाद होगी और कोई दूसरा इसमें शरीक नहीं माना जाएगा। अगर किसी दूसरी जगह भी इसकी कोई जायदाद है तो उसका एतबार नहीं किया जाये। इसी फरमान में जारी राजाज्ञा में कहा गया कि शहंशाह का आदेश है कि- इलाहाबाद सूबे के कालिंजर परगना के अंतर्गत चित्रकूट पुरी के निर्वाणी महंत बालकदास को श्री ठाकुर बालाजी महाराज के पूजा और भोग के लिए बिला लगानी (माफी) आठ गाँव-देवखरी, हिनौता, चित्रकूट, रोदेरा, सिरिया, पढेरी, जरवा और दोहरिया-दान के तौर पर दिए गए हैं और राठ परगना के जाराखाड गाँव की डैढ सौ बीघा जमीन और अमरावती गाँव् की एक सौ अस्सी बीघा जमीन (कुल तीन सौ तीस बीघा) बिला लगान और कोनी-प्रोष्ठा परगना की लगान वसूली से एक रूपया रोजाना अनुदान मंजूर किया जाता है।

तारीख 19 रमज़ान के पवित्र महीने की 19 वीं तारीख को आलमगीर बादशाह के शासनकाल के 35 वें वर्ष में यह फरमान जारी किय गया। वाकये नवीस रफीउल्लाह सआदत खाँ। यह फरमान रमज़ान की 25 वीं तारीख दिन शनिवार को शाही रजिस्टर में दर्ज किया गया। इसे शाही कागज़ात में दर्ज किया नाजिम आफताब खाँ ने।

✳️आलमगीर का वसीयतनामा✳️
सम्राट औरंगज़ेब भारत के कठोर सम्राटों में गिना जाता है। लेकिन जहाँ एक ओर उसने अपने पिता शाहजहाँ को क़ैद में रखा और भाईयों को क़त्ल करवाया, वहाँ दूसरी ओर वह त्याग, सदाचार और कठोर जीवन की प्रतिमूर्ति समझा जाता है। यदि एक और वह स्वेच्छाचारी था तो दूसरी और गरीबी और नम्रता से भरा हुआ। प्रजा की गाढी कमाई का एक पैसा भी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये खर्च करने को वह पाप समझता था। दुनिया के बडे से बडे सम्राटों में उसकी गिनती थी। उसका खजाना हीरे जवाहरात से लबालब था किंतु अधिकतर नमक और बाजरे की रोटी ही पर वह अपना जीवन काटता था। विलानागा उसने जीवन भर गंगाजल का ही व्यवहार किया। वह अपनी सल्तनत को ‘ईशवरीय मार्ग पर अर्पण’ मानता था। मरने से पहले सम्राट आलमगीर ने जो वसीयत की है, उसे देखकर हम इस महान सम्राट के अंतिम दिनों की मानसिक स्थिति को भलि भाँति समझ सकते हैं।

वसीयत की धाराएँ ये हैं-👇👇👇👇

1⃣बुराईयों में डूबा हुआ मैं गुनहगार, वली हज़रत हसन की दरगाह पर एक चादर चढाना चाहता हूँ, क्योंकि जो व्यक्ति पाप की नदी में डूब गया है, उसे रहम और क्षमा के भंडार के पास जाकर क्षमा की भीख माँगने के सिवाय और क्या सहारा है। इस पाक काम के लिए मैनें अपनी कमाई का रुपया अपने बेटे मुहम्मद आज़म के पास रख दिया है। उससे लेकर ये चादर चढा दी जाए।

2⃣टोपियों की सिलाई करके मैनें चार रुपये दो आने जमा किए हैं। यह रकम महालदार लाइलाही बेग के पास जमा हैं। इस रक़म से मुझ गुनहगार पापी का कफ्न खरीदा जाए।

3⃣क़ुरान शरीफ की नक़ल करके मैनें तीन सौ पाँच रुपये इकट्ठा किये हैं। मेरे मरने क बाद यह रक़म फक़ीरों में बाँट दी जाय। यह पवित्र पैसा है इसलिए इसे मेरे क़फन या किसी भी दूसरी चीज़ पर खर्च न किया जाय।

4⃣नेक राह को छोडकर गुमराह हो जाने वाले लोगों को आगाह करने के लिए मुझे खुली जगह पर दफनाना और मेरा सर खुला रहने देना, क्योंकि उस महान शहंशाह परवरदिगार परमात्मा के दरबार में जब कोई पापी नंगे सिर जाता है, तो उसे जरूर दया आ जाती होगी।

5⃣मेरी लाश को ऊपर से सफेद खद्दर के कपडे से ढक देना। चद्दर या छतरी नही लगाना, न गाने बाजे के साथ जुलुस निकालना और न मौलूद करना।

6⃣अपने क़ुटुम्बियों की मदद करना और उनकी इज़्ज़त करना। क़ुरान शरीफ की आयत है- प्राणीमात्र से प्रेम करो। मेरे बेटे! यही तुम्हें मेरी हिदायत है। यही पैगम्बर का हुक़्म है। इसका इनाम अगर तुम्हें इस ज़िन्दगी में नहीं तो अगली ज़िन्दगी में ज़रूर मिलेगा।

7⃣अपने क़ुटुम्बियों के साथ मुहब्बत का बर्ताव करने के साथ-साथ तुम्हें यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि उनकी ताक़त इतनी न बढ जाए कि उससे हुक़ूमत को खतरा हो जाए।

8⃣मेरे बेटे! हुक़ूमत की बागडोर मजबूती से अगर पकडे रहोगे तो तमाम बदनामियों से बच जाओगे।

9⃣बादशाह को हुकूमत में चारों और दौरा करते रहना चाहिये। बादशाहों को कभी भी एक मकाम पर नहीं रहना चाहिए। एक जगह में आराम तो ज़रूर मिलता है, लेकिन कई तरह की मुसीबतों का सामना करना पडता है।

🔟अपने बेटों पर कभी भूलकर भी ऐतबार न करना, न उनके साथ नज़दीकी ताल्लुक रखना।

1⃣1⃣हुकूमत के अन्दर होने वाली तमाम बातों की तुम्हें इत्तला रखनी चाहिए- यही हुक़ूमत की कुँजी है।

1⃣2⃣बादशाह को हुक़ूमत के काम में ज़रा भी सुस्ती नहीं करनी चाहिए। एक लम्हे की सुस्ती सारी ज़िन्दगी की मुसीबत की बाइस बन जाती है।
यह है संक्षेप में सम्राट आलमगीर का वसीयतनामा। इस वसीयत की धाराओं को देखकर यह पता चलता है कि सम्राट को अपने अंतिम दिनों में अपने पिता को क़ैद करने अपने भाईयों को क़त्ल करने पर मनसिक खेद और पश्चाताप था।

इसी वसीयतनामे के मुताबिक़ औरंगाबाद के निकट खुल्दाबाद नामक छोटे से गाँव में जो आलमगीर का मकबरा बनाया गया, उसमें सीधे सादे तरीके से दफन किया गया। उसकी क़ब्र कच्ची मिट्टी की बनाई गई। जिस पर आसमान के सिवाय कोई दूसरी छत नहीं रखी गई। क़ब्र के मुजाविर उसकी क़ब्र पर जब तब हरी दूब लगा देते हैं। इसी कच्चे मज़ार में पडा हुआ भारत का यह महान सम्राट रोजे महशर के दिन तक अपने परमात्मा से रूबरु होने की प्रतीक्षा में है।
अपने बेटे मुअज़्ज़म शाह को उसने मरने से पहले जो खत लिखा, उसमें लिखा- “बादशाहों को कभी आराम या ऐशोइशरत की ज़िन्दगी नहीं बरतनी चाहिए। यह गैरमर्दांगी की आदत ही मुल्कों और बादशाहों के नाश की वजह साबित हुई है। बादशाहों की अपनी हुकूमत में नशीली चीज़ों और शराब बेचने या पीने की कभी इज़ाज़त न देनी चाहिए। इससे रियाया का चरित्र नाश होता है। इस मद की आमदनी को उन्हें हराम समझना चाहिए।“

🌺अपने बनारस के सूबेदार के नाम एक खत में आलमगीर लिखता है🌺

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“अपनी हिन्दू रियाया के साथ ज़ुल्म न करना। उनके साथ धार्मिक उदारता बरतना और उनकी धार्मिक भवनाओं का लिहाज करना।“
आलमगीर मनुष्य मनुष्य के बीच के फर्क को अल्लाह की नज़रों मे गुनाह समझता था। उसका पिता शाहजँहा जब तख्त पर था तो उसने एक बार आलमगीर से शिकायत की कि उसे शहजादे की हैसियत से छोटे बडे सब से एक तरह नहीं मिलना चाहिए। इस पर आलमगीर ने अपने बाप की हर तरह से इज़्ज़त करते हुए जवाब दिया-

“लोगों के साथ मेरा बराबरी का बर्ताव इस्लाम के सिद्धांतों के बिलकुल अनुरूप है। इस्लाम के पैगम्बर ने कभी अपनी ज़िन्दगी में छोटे बडे की तमीज़ नहीं की। खुदा की नज़रों में सब इंसान बराबर हैं। इसलिये मैं आपकी आज्ञा मानने में अपने आप को असमर्थ पाता हूँ।“

ऐसा था वह महान सम्राट, जिस पर इतिहास ने एक काली चादर डाल रखी है और जिसके सम्बन्ध में आम पढे लिखे आदमी के दिल में क्रूरता की एक भयंकर तस्वीर खींची हुई है। जैसे जैसे जाँच पडताल की तेज आँखें विगत के परदे हटाती जाती हैं, वैसे वैसे हमें सम्राट आलमगीर के जीवन के मानवीय पहलू भी दिखाई दे रहे हैं।