साहित्य

चुप रहा, कुछ ना कहा, तो क्या?…यह भी एक प्यार का इज़हार है—-पूर्व जज, दिनेश कुमार शर्मा की कविता!

Dinesh Kumar Sharma
Former District Judge
Patna, India
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मित्रों,
नमस्कार।
काव्य-रचना, एक खास अंदाज़ में, अहसासों की संवाहिका है। उसमें, भाव-पक्ष के अतिरिक्त, विचार-पक्ष भी हो सकते हैं। विचारों से असहमति हो सकती है– स्वाभाविक है।किंतु, तब भी प्रस्तुति के स्तर पर कविता का आनंद हम उठा सकते हैं।
अभी-अभी एक कविता (ग़ज़ल) अवतरित हुई है, जिसे आपकी ख़िदमत में रखना चाहूँगा:-
” नया मंच है, नया किरदार है;
पशोपेश में कलाकार है।
चुप रहा, कुछ ना कहा, तो क्या?
यह भी एक प्यार का इज़हार है!
झलक रहा अमन चेहरे पे, मगर;
अंदर तो दिल बेक़रार है!
थोड़ा ख़ुश हुआ देख आपको;
अब,आप पूछिए, क्या दरकार है!
ज़मीर बेंच कर है पलट रहा;
किस क़दर कमज़ोर है! लाचार है!
ज़रा भी शर्म ,इसका, नहीं उसे;
अहसानफरामोशों में शुमार है!
कानून की नज़र में हो न सही;
तारीख़ की नज़र में गुनहगार है।
महफूज़ मुल्क है तो बेशक जानिए;
सतर्क! होशियार! पहरेदार है।”
——- दिनेश कुमार शर्मा।

(किरदार– पात्र; पशोपेश– असमंजस; अमन- शांति; ज़मीर– व्यक्तिगत ईमान; अहसानफरामोश– कृतघ्न; शुमार– गिनती; तारीख़/तवारीख़– इतिहास;
महफूज़– सुरक्षित)

Dinesh Kumar Sharma
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मित्रों,
चंद पंक्तियाँ आपकी सेवा में:-

“बहुत हुईं शिकायतें, अब बात हो सहमति की;
पीछे चलेंगे कब तक, कुछ बात हो प्रगति की।
भारत खड़ा है, बढ़ा है, सहयोग से, संकल्प से;
बंद हों अब बातें दुराव की, विकृति की।
आपकी तरफ कदम बढ़ाचुका है दिल मेरा;
है प्रतीक्षा बस किसी क्षण आपकी स्वीकृति की!
भेद-भाव कैसा? ऊँच-नीच किसलिए?
पहचान हैं ये बेशक समाज की अवनति की।
कर रहे इकट्ठा साजो सामान बाहर;
कब होगी चिंता हृदय की संपत्ति की?
सत्य अगर शिव है, है तभी वो सुंदर ;
नहीं अलग है इससे समझ किसी जागृति की!
लाख साजिशें हों, और चालबाजियाँ;
जीत होगी आखिर भारत की संस्कृति की।

——– दिनेश कुमार शर्मा।

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