साहित्य

💃💃💃स्त्री की परिभाषा💃💃💃-सीताराम “पथिक” की रचना पढ़िये!

Sitaram Pathik
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💃स्त्री की परिभाषा💃
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किसी ने उजली आशा लिख दी, किसी ने घोर निराशा लिख दी।
जिसने जैसा चाहा जग में, स्त्री की परिभाषा लिख दी।
लिखने वालों ने स्त्री मन, एक बार भी झांक न देखा,
पुरुषों ने तो अपने मन की, सारी बस अभिलाषा लिख दी।
इस समाज ने एक खिलौने, जितनी मात्र अहमियत समझी,
स्त्री के ही नाम से प्रचलित, सारी गंदी भाषा लिख दी।
पुरुष के सम्मुख जिस स्त्री ने, अपने कभी न घुटने टेंके,
उसकी इज्जत उड़ा के कलुषित, मन की सभी हताशा लिख दी।
स्त्री का चुप रहना जग ने, माना बहुत बड़ी कमजोरी,
स्त्री के हिस्से इस कारण, दंड लिख दिए झांसा लिख दी।
स्त्री को जब ढाल न पाया, यह समाज मन के सांचे में,
तब उसको घोषित कर डायन, जग में रक्त पिपासा लिख दी।
अच्छे लोग रहा करते हैं, हर समाज में चाहे कम हों,
ग्रंथ लिखे उनने गरिमा के, महिमा अच्छी खासा लिख दी।
संस्कृति संस्कार जिन घर में, थोड़ी बहुत अभी जिंदा है,
अन्नपूर्णा! मान के उनने, जगजननी को मां सा लिख दी।
किसी ने उजली आशा लिख दी, किसी ने घोर निराशा लिख दी।
जिस ने जैसा चाहा जग में, स्त्री की परिभाषा लिख दी।

-सीताराम “पथिक”
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रीवा मध्यप्रदेश