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कहानी : राजकुमार और परियों की राजकुमारी : पार्ट 2

हमने कहा था कि एक नेत्रहीन राजा था और हाथ देखने वाले एक बूढे व्यक्ति ने कहा था कि परियों की रानी की घोड़ी का दूध इसकी आंख की दवा है। राजा के तीन बेटे थे उनमें से एक बहुत कमज़ोर और दुबला था जबकि दो अन्य ठीक- ठाक और हष्ट- पुष्ट। राजा के तीनों […]

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नीली आंखों का संगीत…जल रहा है, कल आसमान!

Narcisa Liliana Fărcaș ================= मिस्टर । एक्स मेरे मन में 1 नीली आंखों का संगीत जल रहा है । कल आसमान सफेद क्षेत्रों का खेल दिन के दौरान कोई हाथ नहीं । कोहरे में सीटी का रोना । हमारे भीतर प्रकाश का संगीत । जल रहा है । आज धरती । सफेद क्षेत्रों का खेल […]

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गत वर्ष के क्या क्या किस्से, मत सोचो क्या आया हिस्से! नूतन वर्ष में लिख दो, इक नयी कहानी!!

मंजुल सिसोदिया ================ नव वर्ष वो देखो! सूरज की रश्मियों पर हो कर सवार। समय के पहियों को संग लिये, नव वर्ष है आ रहा। कितनें स्वर्णिम सपनें , नयनों में भर अपनें, मानव को ललचा रहा। तुम भी फैला लो, दामन अपना अपना। न जाने क्या क्या, सौगातें है ला रहा। गत वर्ष के […]

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गिरगिट की तरह बदल जाता हूँ मैं….

ता ना बन जाऊँ !!”” नए-नए रंग दिखाता हूँ मैं, गिरगिट की तरह बदल जाता हूँ मैं। रोज़ सोचता हूँ, आज कौन सा रंग दिखाऊँ, मैं कहीं नेता ना बन जाऊँ। पोलें सबकी खोलता हूँ मैं, आज-कल झूठ बहुत बोलता हूँ मैं। “झूठा कहीं का”, ना कहलाऊँ, मैं कहीं नेता ना बन जाऊँ। कल-परसों पर […]

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कहानी : राजकुमार और परियों की राजकुमारी : पार्ट 1

पुराने ज़मान की बात है। एक राजा के तीन बीवियां थीं किंतु किसी से भी उसके संतान नहीं थी। संतान प्राप्त करने के लिए उसने बहुत प्रयास किये किंतु उनका कोई लाभ नहीं निकला। एक दिन महल के बाहर एक साधु आया। राजा की दो बीवियां, जो चतुर और तेज़ थीं, यह सोचकर साधु के […]

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कहाँ से चले थे फिर किधर हो लिए…’मेरे हिस्से के नूर’

Nivedita Chakravorty Writer · Author =========== पेशे ख़िदमत है मेरी एक ग़ज़ल कहाँ से चले थे फिर किधर हो लिए कभी हँसे खुलकर, कभी छुप रो लिए दूसरे के जिस्म में इक अदद दिल है ज़रा समझदारी से आप बोलिए आपका भी घर है नाज़ुक काँच का पत्थर उठा कर ऐसे भी न डोलिए दिल […]

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आप सभ्य हैं क्योंकि ज़ोर से पढ़ पाते हैं पोथी, मैं असभ्य हूँ क्योंकि खुले नंगे पाँवों चलता हूँ

मुदित मिश्र ========· *मैं असभ्य हूँ क्योंकि खुले नंगे पाँवों चलता हूँ मैं असभ्य हूँ क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूँ मैं असभ्य हूँ क्योंकि चीर कर धरती धान उगाता मैं असभ्य हूँ क्योंकि ढोल पर बहुत जोर से गाता* आप सभ्य हैं क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं ऊपर आप सभ्य हैं क्योंकि […]

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तबले भारत महान ना होई

Shikha Singh ======== दाल गेंहू आ धान ना होई एक दिन जब किसान ना होई भूख देखिह सताई रतिया के और ओह पर बिहान ना होई राजनीती से जेतना हम बानी केहू अतना हरान ना होई जे खियावता देश के ओकर कबले पक्का मकान ना होई? कर्ज माथे चढ़ल बा पहिले से तहसे एकर निदान […]

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तब तक तुम्हें अपना बड़ा सा मुंह बन्द रखना चाहिए

Jay Gupt =========== 🙂#अराजनैतिक_लघुकथा — बहुत समय पहले की बात है । लम्बी दूरी की यात्रा करने वाली एक सुंदर सी नन्हीं चिड़िया, अपने झुंड से बिछड़ कर, वर्फीले बादलों से उडती हुई, तेज़ ठंढ से बेहोश हो, जम कर जमीन पर आ गिरी । कुछ ही पलों बाद, वहां से एक गाय गुजरी, उसने […]

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पूरा समाज ही एक लम्बी उदास रात से हो कर गुज़र रहा है, लोग भीड़ में अकेले हैं, थके और उदास!

Kavita Krishnapallavi एक लम्बी, उदास रात से गुजरते हुए ———————————————– * (मेरा यह लेख ‘रविवार डाइजेस्ट’ के नवंबर,2017 अंक में प्रकाशित हुआ था । आज इसकी प्रासंगिकता उस समय से भी अधिक प्रतीत हो रही है ।) * चारों ओर अवसाद का अँधेरा छाया हुआ है। खोखली हँसी, मोबाइल पर बतियाते, इंटरनेट पर चैटिंग करते, […]