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नेपाल और भारत के बीच विवाद और सवालों पर ख़ास रिपोर्ट!

फणींद्र दाहाल
पदनाम,संवाददाता, बीबीसी नेपाली
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नेपाल के पीएम पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचंड’ अगले सप्ताह भारत आने की तैयारी कर रहे हैं, ऐसे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि उन्हें नेपाल-भारत संबंधों के जटिल मुद्दों पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए.

दोबारा प्रधानमंत्री बनने के करीब पांच महीने बाद पीएम प्रचंड अपनी पहली विदेश यात्रा पर 31 मई से चार दिन के भारत दौरे पर आ रहे हैं.

प्रधानमंत्री के तौर पर चौथी बार भारत जा रहे प्रचंड को इसे लेकर संसद में भी सवालों का सामना करना पड़ रहा है.

लेकिन दोनों देशों के रिश्ते बहुत क़रीब होते हुए भी बहुत जटिल हैं. कुछ ऐसे सवाल जो नेपाल सालों से उठाता रहा है लेकिन अभी तक इसका कोई हल नहीं निकल पाया है. आइए इस पर एक नज़र डालते हैं.

1) नेपाल-भारत सीमा समस्या

नेपाल और भारत के अधिकारी कहते रहे हैं कि 98 फीसद सीमा क्षेत्र की मैपिंग हो चुकी है.

लेकिन सर्वेक्षण विभाग के पूर्व महानिदेशक और सीमा विशेषज्ञ बुद्धिनारायण श्रेष्ठ का कहना है कि दोनों देशों के बीच करीब 606 वर्ग किलोमीटर के इलाके को लेकर विवाद है.

उनका कहना है कि कालापानी, लिपुलेख, लिंपियाधुरा में 372 वर्ग किलोमीटर, गंडक क्षेत्र स्थित सुस्ता में 145 वर्ग किलोमीटर और शेष 69 स्थानों में लगभग 89 वर्ग किलोमीटर पर अतिक्रमण किया गया है.

नेपाल और भारत के बीच 1981 से ही सीमांकन का काम शुरू किया गया था.

साल 2005 में, पश्चिमी नेपाल में दारचुला के गरबांग क्षेत्र में सीमा सर्वेक्षण पर गए नेपाल और भारत के सीमा तकनीशियनों के बीच महाकाली नदी कहां से निकलती है, इसी बात पर सहमति नहीं बन पाई थी.

साल 2014 में भारत के पीएम नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान, दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने “सीमा मुद्दे को हमेशा के लिए ठीक करने” का संकल्प लिया था.

बुद्धिनारायण श्रेष्ठ कहते हैं कि समस्या पहले से जटिल हो चुकी है और तकनीकी दक्षता के बजाय राजनीतिक और कूटनीतिक तंत्र की भूमिका अधिक अहम है.

वो कहते हैं, “माउंट एवरेस्ट किसका है, इसे लेकर नेपाल और चीन के बीच भी टकराव था. तकनीकी स्तर पर इसका समाधान नहीं हुआ. जब ये मुद्दा नेपाली पीएम बीपी कोइराला और चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाई के स्तर पर गया तो चीन ने माना कि माउंट एवरेस्ट की चोटी नेपाल की है. राजनीतिक स्तर पर बातें आगे बढ़ती हैं. वरना नेपाल और भारत के बीच सीमा विवाद सुलझने वाला नहीं.”

श्रेष्ठ के अनुसार, नेपाल और भारत के तकनीशियन अभी भी सीमांकन के मुद्दों पर काम कर रहे हैं, लेकिन यह बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहा है.

2) कालापानी, चेकपोस्ट और नक्शा विवाद
साल 1816 में नेपाल और तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई सुगौली संधि में महाकाली नदी को सीमांत नदी माना गया था.

लेकिन महाकाली नदी के उद्गम को लेकर नेपाल और भारत के बीच चल रहे विवाद के चलते दोनों देश कालापानी पर दावा करते रहे हैं.

नेपाली अधिकारी कहते रहे हैं कि संधि के बाद बनाए गए कई मानचित्र कालापानी को नेपाली क्षेत्र के रूप में दिखाते हैं.

साथ ही उनका कहना है कि इस बात के सबूत हैं कि भारत के ब्रिटिश हुक़ूमत से मुक्ति मिलने के बाद भी स्थानीय लोगों ने कई सालों तक नेपाल को टैक्स दिए.

साल 1951 में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया, इससे पैदा होने वाले जोखिमों के मद्देनज़र भारतीय चेकपोस्टों को नेपाल की उत्तरी सीमा की ओर रखा गया था.

‘नेपाल भारत सीमा विवाद: महाकाली और सुस्ता’ पुस्तक के अनुसार, कालापानी क्षेत्र में भारतीय सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी कब से शुरू हुई इसकी अलग-अलग तारीख़ें हैं, लेकिन चीन के साथ युद्ध में बुरी तरह हारने के बाद 1962 में भारतीय सुरक्षा दस्तों की वहां मौजूदगी मजबूत हुई थी.

पंचायत काल में पूर्व प्रधानमंत्री कीर्तिनिधि बिष्ट के कार्यकाल में भारतीय सेना की चौकियों को हटा दिया गया, लेकिन कालापानी में भारतीय सैनिक वहीं रह गए.

हालांकि कुछ का कहना है कि राजा महेंद्र ने अस्थायी रूप से भारतीय सैनिकों को इलाक़े में रहने की अनुमति दी थी, इसका कोई ठोस सबूत नहीं दिखता है.

कालापानी सार्वजनिक बहस का मुद्दा बन गया जब 1996 में नेपाल और भारत के बीच महाकाली संधि को संसद द्वारा अनुमोदित किया गया.

अब तक यह समझौता लागू नहीं हो पाया है, जिसका एक मकसद महाकाली पंचेश्वर परियोजना बनाना भी है.

तत्कालीन प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा द्वारा विपक्षी नेता माधव कुमार नेपाल को लिखी चिट्ठी में ज़िक्र है कि महाकाली के स्रोत का पता लगाने और उसकी मैपिंग करने के लिए एक संयुक्त सर्वेक्षण दल भेजने के लिए नेपाल सरकार और भारत सरकार के बीच एक समझौता हुआ था.

समझौते के मुताबिक़, “सीमांकन के बाद, किसी भी विदेशी सैनिक को नेपाली इलाक़े के अंदर रुकने या रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी.”

साल 1997 में, भारत के तत्कालीन पीएम इंद्र कुमार गुजराल की नेपाल यात्रा के दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने कालापानी समेत अन्य इलाक़ों के बारे में एक महीने के अंदर ज़रूरी सबूतों का अध्ययन करने और सुझाव प्रस्तुत करने का निर्देश दिया. लेकिन वादा पूरा नहीं हो सका.

2014 में पीएम मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान, दोनों देशों के विदेश सचिवों को निर्देश दिया गया कि कालापानी और सुस्ता विवादों को सीमा संबंधी विदेश सचिव स्तरीय बातचीत की मदद से हल किया जाए.

लेकिन एक बार भी उनका बैठक नहीं हुई है.

बल्कि चीन और भारत ने लिपुलेख में एक व्यापार चैनल खोलने पर सहमति जताई, जिसके ख़िलाफ़ नेपाल ने दोनों देशों के साथ विरोध दर्ज कराया.

भारतीय एक्सपर्ट का कहना है कि 1954 से 2015 के बीच दोनों देशों में कई समझौते हुए और बयान जारी हुए लेकिन नेपाल ने कोई सवाल नहीं उठाया.

मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज एंड एनॉलिसिस के रिसर्च फेलो निहार नायक ने लिखा है, “अगर लिपुलेख विवादित क्षेत्र था, तो नेपाल ने उस समय इस मुद्दे को क्यों नहीं उठाया?”

सड़कों के निर्माण पर नेपाल की नाराजगी की खबरों के बीच भारत ने 2019 में कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द करने के लिए अपना नक्शा अपडेट किया.

उस मानचित्र में, कालापानी क्षेत्र को भारतीय क्षेत्र के रूप में रखा गया था. जब उसको लेकर नेपाल ने नाराजगी जतायी तो भारत ने कहा कि यह “सालों से इस्तेमाल की जाने वाली सीमा है.”

कोविड महामारी के चलते दिल्ली ने इस मुद्दे पर तत्काल संवाद की कोई इच्छा नहीं दिखाई, तो दूसरी तरफ़ नेपाल ने भी अपने नक्शे को अपडेट किया और लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी इलाकों को कवर करते हुए ‘मैप’ जारी किया.

उसके बाद नेपाल-भारत संबंधों को सामान्य होने में महीनों लग गए.

अब यह नक्शा नेपाल के संविधान का अंग बन चुका है इसलिए सीमा समस्या के समाधान के लिए नेपाल में व्यापक सहमति बनाने की ज़रूरत है.

नेपाल के दो पूर्व प्रधानमंत्रियों के सलाहकार रह चुके पूर्व राजदूत दिनेश भट्टराई कहते हैं, “यह मुद्दा अब संविधान में ही शामिल है. संप्रभुता से कोई भी समझौता नहीं कर सकता. दोनों देशों के बीच एक विशेष रिश्ता है और किसी को भी इसे जटिल बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.”

विपक्षी दल सीपीएन-यूएमएल के राजन भट्टराई का कहना है कि जिस तरह नया नक्शा जारी किया गया था उसी तरह सीमा मुद्दे को भी राष्ट्रीय सहमति से हल किया जाना चाहिए.

भारतीय अधिकारियों का कहना है कि तत्कालीन नेपाली पीएम देउबा ने जब पिछली बार भारत का दौरा किया था तो सीमा का मुद्दा उठा था.

तत्कालीन भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला के अनुसार, दोनों पक्षों ने ज़िम्मेदारी से और राजनीति से दूर रहते हुए दोस्ताना संबंधों के आधार पर इसे हल करने पर सहमति व्यक्त की थी.

3) एक्सपर्ट समूह की रिपोर्ट
नेपाल के विपक्षी नेता और कई विशेषज्ञ भारत पर विशिष्ट समूह के रिपोर्ट को स्वीकार करने के प्रति उदासीनता दिखाने का आरोप लगा रहे हैं.

असल में 2011 में नेपाल के पीएम बाबूराम भट्टाराई और भारतीय पीएम मनमोहन सिंह के बीच विशिष्ट समूह बनाने पर सहमति बनी थी और इसने 2016 में अपना काम आगे बढ़ाया.

इस समूह को दोनों पक्षों का सम्बन्ध अध्ययन करने और इस बारे में सिफारिशें करने के लिए कहा गया था.

नेपाल और भारत के चार-चार विशेषज्ञों वाले समूह ने 2018 में अपनी रिपोर्ट तैयार की थी.

लेकिन नेपाल के सदस्य राजन भट्टाराई ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पांच साल बीत जाने के बाद भी विशिष्ट समूह के सदस्य रिपोर्ट पेश नहीं कर सके.

“प्रारंभिक बैठक भी नेपाल में हुई थी और पिछली बैठक नेपाल में हुई थी, इसलिए यह निर्णय लिया गया कि पहले भारत को रिपोर्ट सौंपी जाए. हमारे पास हस्ताक्षरित रिपोर्ट है.”

प्रधानमंत्री के स्तर पर लिए गए निर्णय के अनुसार किए गए कार्यों की रिपोर्ट तक पर ध्यान न देने के कारण अब गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है कि दोनों देशों के बीच संबंधों की कितनी विश्वसनीयता है.

कुछ लोग कहते रहे हैं कि यदि भारत रिपोर्ट को स्वीकार नहीं करता है, तो इसे एकतरफा रूप से नेपाली प्रधानमंत्री को प्रस्तुत किया जाना चाहिए या इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए.

लेकिन भट्टाराई ने कहा कि कोई भी एकतरफा फैसला लेने से पहले हमें यह देखना चाहिए कि इसका क्या फायदा है?

सांसदों ने प्रतिनिधि सभा में इस रिपोर्ट को लेकर पीएम प्रचंड से सवाल किए लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला.

पिछले साल मई में भारतीय विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा ने एक भारतीय पत्रकार से कहा था कि कुछ लोगों की रिपोर्ट तक पहुंच है.

उन्होंने यह भी कहा कि रिपोर्ट जमा करने के बाद ही इसकी समीक्षा की जाएगी

4) हवाई मार्ग के एंट्री प्वाइंट
अधिकारियों का कहना है कि एक दशक से अधिक समय हो गया है जब नेपाल ने भारत से थप हवाई मार्ग खोलने को कहा था.

2014 में, जब पीएम मोदी ने 17 वर्षों के अंतराल के बाद नेपाल का दौरा किया, तो नेपाली पक्ष ने भारत से जनकपुर, भैरहवा और नेपालगंज से तीन और हवाई मार्ग प्रदान करने की अपील की.

दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने हवाई सेवा समझौते को सुलझाने के लिए संबंधित एजेंसियों को छह महीने के भीतर बैठक करने का निर्देश दिया था.

पीएम मोदी अपने दूसरे कार्यकाल तक पांच बार नेपाल का दौरा कर चुके हैं. लेकिन हवाई मार्ग को लेकर कोई ठोस फैसला नहीं हो सका है.

नागरिक उड्डयन प्राधिकरण के पूर्व महानिदेशक राजकुमार छेत्री कहते हैं, “पश्चिम से आने वाले सभी विमानों को सिमरा आना पड़ता है. उन्हें सिमरा से काठमांडू आना पड़ता था, अब उन्हें भैरहवा और पोखरा भी पहुंचना पड़ता है. ऐसा करने में अधिक समय लगता है.”

उन्होंने नेपाल से बाहर निकलने के लिए भैरहवा और महेंद्रनगर से दो हवाई मार्ग दिए जाने का जिक्र करते हुए कहा कि उन मार्गों को भी खोलने की अपील की गई है.

उन्होंने कहा, “वे कहते हैं ‘गोरखपुर हमारा सैन्य रणनीतिक क्षेत्र है, इसलिए यह मुश्किल है.”

“कोई मुश्किल हो तो हम महेंद्रनगर से ही प्रवेश करने को कह रहे हैं. हमने इसकी मांग की ताकि वहां से प्रवेश करते हुए भी हम सीधे भैरहवा और पोखरा में उतर सकें.”

उन्होंने बताया कि भैरहवा में 32 अरब रुपये की लागत से निर्मित हवाई अड्डे पर स्थापित इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम के संचालन के लिए अभी भारत से अनुमति प्राप्त की जानी है.

उनके अनुसार, भारत की सहायता अनिवार्य है क्योंकि भैरहवा पहुंचने वाले विमानों को सिस्टम के तहत कम समय के लिए भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ता है, जो खराब मौसम में विमान को स्वचालित रूप से लैंड करने के लिए उपयोग किया जाता है.

“उन उपकरणों का उपयोग नहीं करने के बाद जो जहाज खराब मौसम के दौरान काठमांडू में नहीं उतर सकते, उन्हें भारत या बांग्लादेश जाना पड़ता है. उसके कारण, बहुत नुकसान उठाना पड़ता है.”

भैरहवा में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा एक चीनी ठेकेदार द्वारा एशियाई विकास बैंक से कर्ज लेकर बनाया गया था.

इस हवाई अड्डे का पिछले साल संचालन शुरू हो गया. हालांकि यहां से भारत की कोई सीधी उड़ान सेवा नहीं है.

पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, जिसे चीनी कर्ज लेकर बनाया गया था, यहां भी अभी तक कोई अंतरराष्ट्रीय उड़ानें नहीं हैं.

कुछ जानकार कहते हैं कि निर्माण में चीन के शामिल होने की वजह से भारत एयरपोर्ट में दिलचस्पी नहीं ले रहा है.